उत्तराखंड के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए एक ऐसी खबर आई है जो सीधे उनकी जेब और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी है. राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने स्टेट गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम यानी गोल्डन कार्ड योजना में एक अहम बदलाव किया है — अब किसी भी सूचीबद्ध अस्पताल को तब तक उसके बिल का भुगतान नहीं होगा, जब तक कि वह मरीज का हस्ताक्षर किया हुआ फीडबैक फॉर्म प्राधिकरण को नहीं सौंपता.

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असल बात यह है कि कैशलेस इलाज की सुविधा जितनी राहत देती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है. अब तक की स्थिति यह थी कि मरीज अस्पताल में भर्ती होता था, इलाज होता था और वह घर चला जाता था- लेकिन उसे यह पता ही नहीं होता था कि उसके नाम पर कौन सी जांचें हुईं, कौन सी दवाइयां दी गईं और कुल कितनी राशि का दावा अस्पताल ने सरकार से किया. इस अंधेरे का फायदा उठाकर कुछ अस्पताल फर्जी या बढ़ा-चढ़ाकर क्लेम करते रहे और मरीज को भनक तक नहीं लगी.

डिस्चार्ज के समय मरीज से फीडबैक फॉर्म भरवाना अनिवार्य

प्राधिकरण के अध्यक्ष अरविंद सिंह ह्यांकी ने माना कि यह खामी लंबे समय से चली आ रही थी. इसीलिए अब वह व्यवस्था लागू की गई है जो पहले से आयुष्मान भारत और अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना में काम कर रही थी — यानी डिस्चार्ज के समय मरीज से फीडबैक फॉर्म भरवाना अनिवार्य.

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फॉर्म में क्या-क्या दर्ज होगा?

यह फॉर्म महज एक कागजी खानापूर्ति नहीं है. इस फॉर्म में इलाज की पूरी प्रक्रिया का ब्योरा होगा जैसे- कौन सी जांचें हुईं, कौन सी दवाइयां दी गईं, किस प्रक्रिया से इलाज किया गया और कुल कितना खर्च आया. मरीज को यह सब बताया जाएगा और उसके हस्ताक्षर लिए जाएंगे. इसका सीधा मतलब यह है कि अस्पताल अब मरीज को अंधेरे में रखकर मनमाना क्लेम नहीं कर सकेंगे.

इसके अलावा प्राधिकरण यह भी सुनिश्चित करेगा कि मरीज से कैशलेस सुविधा के बावजूद कोई अतिरिक्त रकम तो नहीं वसूली गई. अगर ऐसा हुआ तो फीडबैक फॉर्म इसकी गवाही देगा.

सिर्फ फॉर्म नहीं, फोन से भी होगी जांच

प्राधिकरण ने यह भी तय किया है कि दावों की जांच के दौरान कुछ मरीजों को रैंडम तरीके से फोन किया जाएगा. अस्पताल ने फॉर्म में जो जानकारी दी है, उसकी पुष्टि सीधे मरीज से की जाएगी. यह कदम इसलिए जरूरी था क्योंकि केवल फॉर्म भरवा लेने से धांधली की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती, अगर फोन पर मरीज की बात अस्पताल के दावे से मेल नहीं खाती, तो क्लेम रद्द हो सकता है.

योजना की स्थिति — आंकड़े बताते हैं दांव कितना बड़ा है

गोल्डन कार्ड योजना का दायरा छोटा नहीं है. पूरे प्रदेश में 5.16 लाख से अधिक एसजीएचएस कार्डधारक हैं. अब तक 1.73 लाख मरीज भर्ती होकर कैशलेस इलाज का लाभ उठा चुके हैं और इस पर 641 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं. ओपीडी के 1.83 लाख दावों पर अलग से 300 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है. इतनी बड़ी राशि जब सरकारी खजाने से जाती है तो जवाबदेही का तंत्र मजबूत होना ही चाहिए.

आम कर्मचारी और पेंशनर के लिए इसका मतलब

इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन्हें होगा जो बीमार पड़ते हैं और अस्पताल की कागजी प्रक्रिया से अनजान रहते हैं. अब उन्हें डिस्चार्ज से पहले पूरी जानकारी मिलेगी. अगर कोई अस्पताल उनसे अतिरिक्त पैसा मांग रहा है या फॉर्म भरने से मना कर रहा है — तो यह सीधे नियमों का उल्लंघन होगा और वे प्राधिकरण से शिकायत कर सकते हैं.