उत्तराखंड में हर एक-दो साल के अंतराल में वनाग्नि की घटनाएं अप्रत्याशित रूप से छलांग मारती हैं. हालांकि, इस बार खतरे की घंटी समय से पहले बज चुकी है. हालातों की गंभीरता को देखते हुए सरकार और वन विभाग ने इस बार सिर्फ पुरानी लकीर पीटने के बजाय तकनीक, आधुनिक संसाधनों और सबसे बढ़कर स्थानीय ग्रामीणों के पारंपरिक ज्ञान को मिलाकर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार किया है.
विभाग के आधिकारिक बुलेटिन के अनुसार, चालू वनाग्नि सीजन में 15 फरवरी 2026 से लेकर 25 मई 2026 के बीच ही पूरे प्रदेश में आगजनी की 394 भीषण घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं. इन घटनाओं में अब तक 331.12 हेक्टेयर बेशकीमती वन संपदा जलकर राख हो चुकी है. इस आग ने वन्यजीवों और वनस्पतियों के साथ-साथ एक इंसानी जिंदगी को भी लील लिया है.
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गढ़वाल मंडल पर सबसे तगड़ी मार
भौगोलिक और क्षेत्रीय ताने-बाने को देखें तो इस बार कुमाऊं या वन्यजीव अभ्यारण्यों के मुकाबले गढ़वाल के जंगलों ने ज्यादा कीमत चुकाई है. कुल 394 मामलों में से अकेले गढ़वाल क्षेत्र के 285 मामले दर्ज किये गए, जहां सबसे ज्यादा 241.32 हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो गया. इसके मुकाबले कुमाऊं मंडल में 74 घटनाओं में 64.05 हेक्टेयर और वन्यजीव (वाइल्डलाइफ) इलाकों में 35 घटनाओं के साथ 25.75 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ.
चमोली बना सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो चमोली जिला वनाग्नि की सबसे भीषण मार झेल रहा है. अकेले चमोली में रिकॉर्ड 135 पथरीली और जंगली पहाड़ियां धधक उठीं. इसके बाद टिहरी गढ़वाल में 45, पौड़ी गढ़वाल में 42, रुद्रप्रयाग में 39 और सीमांत जिले पिथौरागढ़ में 37 जगहों पर आग ने तांडव मचाया. राहत की बात बस इतनी है कि मैदानी जिले हरिद्वार में अब तक सिर्फ 1 घटना सामने आई है.
बद्रीनाथ प्रभाग की स्थिति गंभीर
वन प्रभागों (डिवीजन) की बात करें तो भगवान बद्रीविशाल के कपाट खुलने के साथ ही बद्रीनाथ वन प्रभाग में सबसे ज्यादा 72 आगजनी के मामले आए. वहीं, पिथौरागढ़ और रुद्रप्रयाग प्रभागों में भी 37-37 बार जंगलों में आग भड़कने की पुष्टि हुई.
बारूद का ढेर बने 'चीड़ के जंगल' और सरकार का मास्टरस्ट्रोक
उत्तराखंड के पास लगभग 25,138 वर्ग किलोमीटर का एक विशाल आरक्षित वन क्षेत्र है, लेकिन इसका एक बड़ा स्याह पहलू यह है कि इस कुल वन क्षेत्र का 15.45% हिस्सा (लगभग 3890.526 वर्ग किमी) सिर्फ चीड़ के जंगलों से घिरा है. गर्मियों के दिनों में चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'पिरुल' कहा जाता है, पूरे जंगल के लिए बारूद का काम करती हैं. एक छोटी सी चिंगारी भी इस पिरुल के संपर्क में आते ही मीलों दूर तक आग फैला देती है.
इस बार सरकार ने इस पिरुल को ही आपदा से अवसर में बदलने की ठानी है.सरकार पिरुल इकट्ठा करने के बदले ग्रामीणों को 10 रुपये प्रति किलोग्राम की नकद राशि दे रही है. इस साल विभाग ने 8,555 टन पिरुल इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा था, जिसके मुकाबले अब तक 13,003.56 टन पिरुल जंगलों से हटाया जा चुका है. इस पिरुल को ठिकाने लगाने और इससे बायो-फ्यूल बनाने के लिए राज्य में 9 पैलेट्स और ब्रिकेट्स उत्पादन इकाइयां दिन-रात काम कर रही हैं.
हाईटेक कमान - सैटेलाइट से लेकर वॉकी-टॉकी तक का पहरा
इस बार वन विभाग ने अपनी रणनीति में 'रिस्पॉन्स टाइम' (को कम करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया है. इसके लिए पांच स्तरों पर तगड़ी घेराबंदी की गई है:
1.मौसम विभाग से सीधा गठबंधन (MoU)
आग लगने के बाद भागने से बेहतर है कि पहले ही पता चल जाए कि कहां खतरा ज्यादा है. इसके लिए वन विभाग ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के साथ बकायदा एक समझौता किया है. इसके तहत विभाग Customized Forest Fire फॉरेकास्ट यानी वनाग्नि के लिए विशेष मौसम पूर्वानुमान मिलता है, जिससे संवेदनशील इलाकों में टीमें पहले ही अलर्ट हो जाती हैं.
2. आईसीसीसी और क्रू-स्टेशनों का जाल
देहरादून मुख्यालय के स्तर पर एक अत्याधुनिक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) चौबीसों घंटे काम कर रहा है. इसके अलावा जमीनी स्तर पर मुस्तैदी के लिए राज्यभर में 1438 क्रू-स्टेशन 40 मास्टर कंट्रोल रूम और ऊंचे पहाड़ों पर 174 वॉच टावर स्थापित किए गए हैं. दूरदराज के इलाकों में जहां मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता, वहां के लिए फील्ड स्टाफ को 45 रिपीटर, 488 बेस सेट, 1548 वॉकी-टॉकी हैंडसेट और 1507 जीपीएस (GPS) डिवाइस बांटे गए हैं.
3. 'फायर वाचरों' को 10 लाख का सुरक्षा कवच
जंगलों की आग से सीधे दो-दो हाथ करने वाले 5,625 जांबाज 'फायर वाचरों' की तैनाती की गई है. इस बार सरकार ने उनके रिस्क को समझते हुए सभी फायर वाचरों को 10 लाख रुपये का सामूहिक दुर्घटना बीमा कवर दिया है, ताकि वो बिना किसी मानसिक डर के जंगलों को बचा सकें.
4. जनभागीदारी और आर्थिक मदद
सरकारी अमला अकेले इतने बड़े जंगलों को नहीं बचा सकता, इसलिए गांवों और ग्राम पंचायतों के क्लस्टर स्तर पर 496 वनाग्नि सुरक्षा प्रबंधन समितियां बनाई गई हैं. जो समितियां आग बुझाने और वनों को सुरक्षित रखने में वन विभाग की मदद कर रही हैं, उन्हें सरकार की तरफ से 30,000 रुपये प्रति समिति का प्रोत्साहन भत्ता दिया जा रहा है. आम लोगों की सुविधा के लिए IVRS टोल-फ्री नंबर 1926 और 'उत्तराखंड फॉरेस्ट फायर मोबाइल ऐप' भी चालू है, जहां कोई भी राहगीर आग की सूचना तुरंत फोटो के साथ दे सकता है.
5. विश्व बैंक की मदद से मिले आधुनिक उपकरण
इस जंग में वन कर्मियों को झुलसने से बचाने के लिए विश्व बैंक पोषित U-प्रेपर योजना संजीवनी बनकर आई है. इसके तहत मैदानी और पहाड़ी प्रभागों के कर्मचारियों को आग रोधी विशेष सूट (Fire Resistant Suit), गल्व्स, हेलमेट, हाई-एंकर शूज, पानी की बोतलें और रात में काम करने के लिए 7145 हेड लाइटें बांटी गई हैं. समन्वय परखने के लिए सभी जिलों के कप्तानों और जिलाधिकारियों की देखरेख में वनाग्नि मॉक ड्रिल भी पूरी की जा चुकी है.
उत्तराखंड के जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं हैं, ये उत्तर भारत की नदियों के उद्गम, शुद्ध हवा और करोड़ों वन्यजीवों का आशियाना हैं. वन विभाग के बड़े अफसरों को जिलों का नोडल अधिकारी बनाकर खुद मोर्चे पर उतारा गया है. अंतर-विभागीय बैठकों के जरिए सेना, जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन को भी 'स्टैंडबाय' पर रखा गया है.
