उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजभवन में बड़ा बदलाव हुआ है. मध्य प्रदेश के वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है. 

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चार बार विधायक, मंत्री और सांसद रह चुके बिसेन पवार समुदाय से आते हैं, जिसे मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से जोड़ा जाता है. ऐसे में उनकी नियुक्ति के प्रशासनिक पहलुओं के साथ सामाजिक और राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं. सवाल है कि क्या चुनाव से पहले इस नियुक्ति के जरिए बीजेपी के सामाजिक समीकरणों को कोई नया संदेश मिल सकता है?

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कौन हैं उत्तराखंड के नए राज्यपाल ढाल सिंह बिसेन?

डॉ. ढाल सिंह बिसेन मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के रहने वाले हैं. उनका जन्म 14 मई 1952 को पिपरिया गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम सेवाराम बिसेन और माता का नाम सोनाबाई बिसेन था. उनकी पत्नी का नाम भानुमती बिसेन है. महाकौशल क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहे बिसेन की पहचान बीजेपी के अनुभवी नेताओं में रही है. राजनीति के अलावा उनका जुड़ाव चिकित्सा व्यवसाय और कृषि से भी रहा है.

चार बार विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रहे

बिसेन पहली बार 1990 में मध्य प्रदेश विधानसभा पहुंचे. इसके बाद 1993, 1998 और 2003 में भी उन्होंने चुनाव जीता. वह राज्य सरकार में वन, परिवहन, खनिज संसाधन, स्कूल शिक्षा और जेल जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

इसके बाद वह मध्य प्रदेश राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष भी रहे. वर्ष 2019 में बीजेपी ने उन्हें बालाघाट लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा, जहां उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मधु भगत को 2.42 लाख से अधिक मतों के अंतर से हराया. वह 2024 तक सांसद रहे.

किस जाति समुदाय से आते हैं ढाल सिंह बिसेन?

ढाल सिंह बिसेन पवार समुदाय से आते हैं. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों में उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. मध्य प्रदेश में पवार समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग से जोड़ा जाता है.

हालांकि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना अलग-अलग है. इसलिए बिसेन की नियुक्ति को सीधे उत्तराखंड के किसी विशेष जातीय समूह से जोड़कर देखना आसान नहीं है.

कितने पढ़े-लिखे हैं नए राज्यपाल?

बिसेन ने रायपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्वेदिक कॉलेज से चिकित्सा से संबंधित शिक्षा प्राप्त की है. लोकसभा के आधिकारिक परिचय के अनुसार उनकी शैक्षिक योग्यता एवीएमएस और डीएचबी है. विधायक, मंत्री और सांसद के रूप में उनका लंबा कार्यकाल रहा है. इस दौरान उन्होंने विधायी कामकाज के साथ विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाई हैं.

2027 से पहले OBC समीकरणों पर क्या असर?

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं. ऐसे समय OBC पृष्ठभूमि वाले बीजेपी के पूर्व नेता की राज्यपाल पद पर नियुक्ति के सामाजिक संदेश को लेकर राजनीतिक चर्चा हो सकती है.

बीजेपी उत्तराखंड में अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच अपना जनाधार बनाए रखने की कोशिश करती रही है. ऐसे में सवाल उठ सकता है कि क्या इस नियुक्ति को पार्टी के व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में भी देखा जाएगा?

क्या बीजेपी ने राजभवन में नया प्रयोग किया है?

उत्तराखंड में राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को राज्यपाल बनाना कोई पहली घटना नहीं है. इससे पहले भगत सिंह कोश्यारी, बेबी रानी मौर्य और अजीज कुरैशी जैसे नेता भी इस पद पर रह चुके हैं. लेकिन मौजूदा नियुक्ति की चर्चा इसलिए है क्योंकि अब तक राजभवन की जिम्मेदारी सेना के वरिष्ठ अधिकारी रहे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह संभाल रहे थे. अब उनकी जगह लंबे राजनीतिक अनुभव वाले बिसेन को यह जिम्मेदारी मिली है. यह बदलाव राज्यपाल की व्यक्तिगत और पेशेवर पृष्ठभूमि के लिहाज से महत्वपूर्ण है.

चुनाव में क्या होगी नए राज्यपाल की भूमिका?

2027 के विधानसभा चुनाव में राज्यपाल की कोई दलगत चुनावी भूमिका नहीं होगी. उनका काम संविधान के दायरे में रहकर जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है. हालांकि चुनाव के बाद सरकार गठन, विधानसभा के संवैधानिक कामकाज और अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.

उत्तराखंड में नई जिम्मेदारी संभालने जा रहे बिसेन के सामने अब राजनीतिक जीवन से अलग संवैधानिक पद की अपेक्षाओं पर काम करने की चुनौती होगी. उनकी नियुक्ति को लेकर सामाजिक और राजनीतिक चर्चाएं अपनी जगह हैं, लेकिन उनके कार्यकाल का आकलन राजभवन में लिए जाने वाले संवैधानिक फैसलों से ही होगा.

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