उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है. एक जुलाई से राज्य में बरसों से चल रहा मदरसा शिक्षा बोर्ड समाप्त हो जाएगा और उसकी जगह नया अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण काम करना शुरू कर देगा. इस बदलाव के साथ ही मदरसों में पीएम पोषण योजना यानी मिड-डे मील को लेकर भी सख्त शर्त लागू हो जाएगी.

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अब वही मदरसे और अन्य अल्पसंख्यक स्कूल इस योजना का फायदा उठा सकेंगे, जो विद्यालयी शिक्षा विभाग से बाकायदा संबद्ध होंगे. बिना संबद्धता वाले संस्थानों को यह सुविधा नहीं मिलेगी.             

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की बैठक में हुआ फैसला 

इस फैसले की पुष्टि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में हुई एक अहम बैठक के बाद हुई है. पिछले गुरुवार विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते की अध्यक्षता में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी, जिसका कार्यवृत्त सोमवार को सार्वजनिक किया गया. बैठक में साफ कर दिया गया कि नई व्यवस्था के तहत मान्यता पाने के लिए मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों को निर्धारित नियमावली के मुताबिक सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ आवेदन करना अनिवार्य होगा. जो मदरसे ऑनलाइन आवेदन कर चुके हैं, उनके मामलों को प्राथमिकता पर निपटाने का निर्देश भी शिक्षा विभाग को दिया गया है, ताकि बदलाव के दौर में संस्थानों को परेशानी न उठानी पड़े.

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राहत की बात यह है कि जो मदरसे पहले से शिक्षा विभाग के तय मानकों पर चल रहे हैं, उन्हें मान्यता देने में कोई अड़चन नहीं आएगी. साथ ही ऐसे मदरसे जो अपने नाम के आगे जूनियर हाईस्कूल, हाईस्कूल या इंटरमीडिएट जैसी मान्यता हासिल करना चाहते हैं, उन्हें शिक्षा विभाग के मौजूदा नियमों के अनुसार ज़रूरी सुविधाएं और मौके दिए जाएंगे. यानी स्तर बढ़ाने की चाहत रखने वाले मदरसों के लिए रास्ता बंद नहीं किया गया है, बल्कि एक तय प्रक्रिया से गुजरना होगा.

एनईपी के मुताबिक होगा पाठ्यक्रम 

पाठ्यक्रम के मोर्चे पर भी बदलाव तय है. बैठक में फैसला हुआ कि नया अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण मदरसों समेत सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार करेगा. हालांकि इसे लागू करने से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी होगा, उसके बाद ही यह सभी संस्थानों पर अमल में आएगा.

गौरतलब है कि अभी तक उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड ही इन संस्थानों के नियमन का काम देखता रहा है, लेकिन एक जुलाई से जैसे ही अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम के तहत बना राज्य प्राधिकरण प्रभाव में आएगा, उसी दिन मदरसा बोर्ड का वजूद भी खत्म हो जाएगा. इस बदलाव का दायरा सिर्फ मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदायों के शिक्षण संस्थान भी अब इसी प्राधिकरण के अंतर्गत आ जाएंगे. यानी आने वाले दिनों में राज्य के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों का नियमन एक ही छत के नीचे होगा, जिससे नीतिगत स्पष्टता और निगरानी दोनों आसान होने की उम्मीद जताई जा रही है.

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