उत्तराखंड में भालुओं की बढ़ती सक्रियता ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. शीतकाल में आमतौर पर शीत निद्रा (हाइबरनेशन) में चले जाने वाले भालू इस बार अच्छे से  बर्फबारी न होने के कारण पूरी तरह सो नहीं पाए हैं. जिस वजह से वे भोजन की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं. जनवरी से अब तक राज्य में भालू के हमलों की नौ घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में दहशत का माहौल है.

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पिछले साल भी भालू हमलों में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. पूरे साल में 116 हमले हुए थे, जिनमें आठ लोगों की जान गई और 108 लोग घायल हुए थे. इस बार भी हालात चिंताजनक होते दिख रहे हैं. वन विभाग ने पहले उम्मीद जताई थी कि सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी होने पर भालू शीत निद्रा में चले जाएंगे और हमलों में कमी आएगी, लेकिन अब तक हुई बर्फबारी को विशेषज्ञ पर्याप्त नहीं मान रहे हैं.

भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सत्य कुमार के अनुसार, भालुओं के शीत निद्रा में जाने के लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम से कम तीन महीने तक लगभग एक फीट गहरी बर्फ जमी रहनी चाहिए. लेकिन इस साल अक्तूबर के बाद से साला और बर्फबारी सामान्य से कम रही है. तापमान भी उतना नहीं गिरा, जिससे भालू सक्रिय बने हुए हैं.

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बीते एक दशक से बर्फबारी की वजह से पैटर्न में देखा गया बदलाव 

वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक पंकज चौहान का कहना है कि बीते एक दशक से बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव देखा जा रहा है. दिसंबर और जनवरी में नियमित अंतराल पर पांच से छह बार बर्फबारी होना जरूरी है, जो अब नहीं हो पा रहा. जो बर्फ गिरती भी है, वह प्री-समर में गिरती है और तेजी से पिघल जाती है.

गढ़वाल वृत्त के वन संरक्षक आकाश वर्मा ने बताया कि कुछ संवेदनशील इलाकों में निगरानी और सुरक्षा बढ़ाई गई है. लोगों से सतर्क रहने और वन क्षेत्रों में अनावश्यक आवाजाही से बचने की अपील की गई है.