न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालयों के जजों के खिलाफ मिली शिकायतों की जानकारी सार्वजनिक कर दी है. सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत यह जानकारी देने वाला यह देश का पहला हाईकोर्ट बन गया है. इस फैसले को न्यायपालिका में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

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2020 से 2025 के बीच मिलीं 258 शिकायतें

हाईकोर्ट के सतर्कता प्रकोष्ठ के मुताबिक 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कुल 258 शिकायतें दर्ज हुईं.

इन शिकायतों की जांच के बाद चार न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है. हालांकि किसी भी जज या अधिकारी का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है, ताकि उनकी व्यक्तिगत पहचान सुरक्षित रहे.

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यह पूरा मामला मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान), हल्द्वानी के संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के बाद सामने आया. उन्होंने 2020 से 2025 के बीच जजों के खिलाफ आई शिकायतों की संख्या, लागू नियम, की गई कार्रवाई और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी.

शुरुआत में हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि शिकायतें संवेदनशील और गोपनीय प्रकृति की हैं. साथ ही कहा गया कि ऐसी सूचना देने के लिए मुख्य न्यायाधीश की अनुमति जरूरी है.

राज्य सूचना आयोग का दखल

जानकारी न मिलने पर संजीव चतुर्वेदी ने राज्य सूचना आयोग में अपील की. आयोग ने साफ कहा कि केवल “गोपनीय” बताकर सूचना रोकी नहीं जा सकती. आयोग के अनुसार शिकायतों की संख्या और उनकी निस्तारण प्रक्रिया सार्वजनिक हित से जुड़ी है, बशर्ते किसी की व्यक्तिगत पहचान उजागर न हो.

आयोग ने एक महीने के भीतर सूचना देने के निर्देश दिए. इसके बाद 11 फरवरी को लोक सूचना अधिकारी एवं संयुक्त रजिस्ट्रार एच.एस. जीना ने मांगी गई जानकारी उपलब्ध करा दी.

अन्य हाईकोर्ट ने किया था इनकार

गौरतलब है कि इससे पहले छत्तीसगढ़, मद्रास और दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी तरह की जानकारी देने से इनकार कर दिया था. ऐसे में उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह कदम अलग और सराहनीय माना जा रहा है.

अपीलकर्ता अधिवक्ता सुदर्शन गोयल का कहना है कि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता जरूरी है. उनका मानना है कि यह फैसला न्याय व्यवस्था को और मजबूत करेगा.