उत्तराखंड में बुधवार (2 सितंबर) को बुग्याल संरक्षण दिवस मनाया जा रहा है. इस मौके पर हिमालय की ऊंचाई पर बसे हरे भरे मैदानों की अहमियत एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने बुग्यालों को लेकर बेहद चिंताजनक रिपोर्ट पेश की है.

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रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में कुल 82 प्रमुख बुग्याल हैं, जो मिलाकर करीब 8,524 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले हुए हैं. हालांकि बीते कुछ सालों में इन इलाकों पर पर्यटन, ओवरग्रेजिंग, संसाधनों के बेतहाशा दोहन और बदलते मौसम का इतना दबाव बढ़ा है कि इनका अस्तित्व खतरे में आ गया है.

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दयारा बुग्याल पर मंडराया खतरा

समुद्र तल से करीब 3500 मीटर की ऊंचाई पर दायरा बुग्याल करीब 338 वर्ग किलोमीटर में फैला है और अपनी खूबसूरती के लिए काफी मशहूर है. इसी वजह से पिछले पांच सालों में यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में 186 प्रतिशत तक का उछाल देखने को मिला है.

हालांकि लगातार बढ़ रही आवाजाही से मिट्टी का कटाव तेज हुआ है जो इस बुग्याल के संरक्षण को लेकर चिंता का सबब बना हुआ है. बुग्यालों पर यह संकट अकेले पर्यटन तक सीमित नहीं है. कैलाश सेक्रेड लैंडस्केप के आंकड़े इसकी दूसरी तस्वीर दिखाते हैं, जहां करीब 13 प्रतिशत क्षेत्र चराई के लिए इस्तेमाल हो रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में 40 हजार 500 से ज्यादा भेड़-बकरियां और लगभग 1400 मवेशी व घोड़े चराई पर निर्भर हैं. पशुओं की बढ़ती संख्या और अनियंत्रित चराई घासभूमियों को कमजोर कर रही है. साथ ही इस से जैव विविधता को भी नुकसान हुआ है.

दुर्लभ प्रजातियों पर भी खतरा

बुग्यालों का उजड़ना सिर्फ घास के मैदानों के खत्म होने की कहानी नहीं है, बल्कि इसके साथ कई दुर्लभ और प्रजातियों का अस्तित्व भी जुड़ा है. यहां कुटकी, जटामांसी और अतीस जैसी औषधीय वनस्पतियां पाई जाती हैं.

तो वहीं कस्तूरी मृग, भालू, हिमालयन तहर और मोनाल जैसे वन्यजीव इसी तंत्र पर निर्भर हैं. राज्य के अन्य बुग्यालों में स्नो लेपर्ड और ब्लू शीप जैसी दुर्लभ प्रजातियां भी देखी जाती हैं. बुग्यालों के खतरे में आने से इन प्रजातियों का भविष्य भी खतरे में नजर आ रहा है. 

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