गंगोत्री सीट का गजब इतिहास, जिसे मिला जीत का ताज उसकी ही बनी सरकार!
उत्तराखंड की गंगोत्री विधानसभा से एक अनोखा मिथक जुड़ा है. मान्यता है कि जो भी विधायक इस सीट से बनता है, प्रदेश में उसकी ही सरकार बनती है. 2027 के चुनाव में यहां कांटे की टक्कर हो सकती है.

उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले की गंगोत्री विधानसभा सीट के बारे में एक मिथक है जो दशकों से चला आ रहा है. कहा जाता है कि गंगोत्री विधानसभा उन चुनिंदा विधानसभा सीटों में से एक है जो उत्तराखंड की सत्ता तय करती है और जो पार्टी इस सीट पर बाज़ी मार ले वही प्रदेश में अपनी सरकार भी बनाती है. दिलचस्प बात यह है कि यह मान्यता उत्तराखंड राज्य गठन से ही नहीं बल्कि 1958 से चली आ रही है, जब उत्तराखंड एक अलग राज्य नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था.
राज्य गठन से लेकर अब तक गंगोत्री सीट पर पांच बार चुनाव आयोजित हो चुके हैं और यह सीट किसी भी दल का स्थायी किला नहीं है. इस सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बीच हमेशा हुई कड़ी टक्कर देखने को मिली है. वर्ष 2002 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी विजयपाल सिंह सजवान ने 7878 वोट पाकर गंगोत्री विधानसभा सीट से अपनी जीत दर्ज की.
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इस चुनाव में सजवान की सीधी टक्कर कम्युनिस्ट पार्टी और इंडिया की प्रत्याशी कमला राम नौटियाल के साथ देखने को मिली जिन्हें जानता ने 7268 वोटों का समर्थन दिया था वहीं भाजपा के बुद्धि सिंह पंवार 6822 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे.
2007 में बीजेपी ने बाजी मारी
2007 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा पूरी तरह से बदल गया भाजपा के प्रत्याशी गोपाल सिंह रावत कुल मतदाताओं का 47 फीसदी वोट पाकर इस सीट से विधायक चुने गए. गोपाल सिंह रावत को इस चुनाव में कुल 24250 वोट मिले, वहीं कांग्रेस से विजयपाल सिंह सजवान 18704 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, तीसरे स्थान पर रहे बहुजन समाज़ पार्टी के चैतराम को 2348 वोट मिले.
इस चुनाव में सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि 2002 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रही और कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने वाली CPI की प्रत्याशी कमला राम नौटियाल मात्र 2272 वोटों पर ही सिमट कर रह गयीं.
2012 में कांग्रेस ने जीत हासिल की
2012 विधानसभा चुनाव में इस सीट पर विधायक के साथ साथ उत्तराखंड की सत्ता में एक बार फिर परिवर्तन देखने को मिला. एक बार फिर इस गंगोत्री की जानता ने 40 प्रतिशत समर्थन के साथ 20246 वोट देकर कांग्रेस के विजयपाल सिंह सजवान को अपना विधायक चुना. भाजपा प्रत्याशी गोपाल सिंह रावत 13223 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे.
2017 में बीजेपी ने कब्जाई सीट
2017 विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जानता का समर्थन भाजपा प्रत्याशी गोपाल सिंह रावत की तरफ़ देखने को मिला. इस चुनाव में गोपाल सिंह रावत को 25683 वोटों से क्षेत्र की जानता ने अपना प्रतिनिधि चुना, वहीं कांग्रेस के विजयपाल सिंह सजवान को इस विधानसभा चुनाव में 16073 वोटों का समर्थन मिला और वह दूसरे स्थान पर रहे .
2022 में भी बीजेपी का कब्जा रहा
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले ही भाजपा विधायक गोपाल सिंह रावत की आकस्मिक मृत्यु हो गई. दिवंगत गोपाल सिंह रावत कई वक्त से स्पाइनल कैंसर से जूझ रहे थे. 23 अप्रैल 2021 को रावत ने देहरादून के एक निजी अस्पताल में आखरी सांस ली. 2022 चुनाव तक इस सीट पर कोई उपचुनाव नहीं हुआ और यह सीट खाली रही.
भाजपा ने 2022 के चुनाव में इस सीट पर सुरेश चौहान को पार्टी का टिकट देकर मैदान में उतारा और यह सीट 29619 वोटों के साथ भाजपा के खेमे में गई. दूसरे स्थान पर कांग्रेस के प्रत्याशी विजयपाल सिंह सजवान 21590 वोटों के साथ रहे. इस वर्ष के चुनाव में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री चेहरे रहे कर्नल अजय कोठियाल ने भी इस सीट से चुनाव लड़ा हालांकि 6161 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहते हुए उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा.
कौन हैं इस सीट से दावेदार ?
2027 चुनाव के लिए किसी पार्टी ने औपचारिक रूप से किसी प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है. हालांकि गंगोत्री विधानसभा सीट की राजनीति भाजपा और कांग्रेस के बीच ही केंद्रित रही है. भाजपा से सीटिंग विधायक सुरेश सिंह चौहान एक बार फिर इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं. वहीं कांग्रेस से दो बार के विधायक रह चुके विजयपाल सिंह सजवान पर पार्टी अपना भरोसा जताते हुए एक बार फिर उन पर अपना दांव खेल सकती है.
खास बात यह भी है कि इस सीट पर जितना स्थानीय नेताओं का दबदबा देखने को मिलता है उतना असर राज्य स्तर के बड़े नेताओं का नज़र नहीं आता. यह बात अलग है कि भाजपा को 2022 के चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे का लाभ जरुर मिला है. हालांकि कांग्रेस या भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व का व्यक्तिगत प्रभाव इस सीट पर उतना खास नहीं है.
गौरतलब है कि इस सीट की सत्ता परिवर्तन की मान्यता के चलते इस सीट पर हर पार्टी की विशेष नजर रहती है और यही कारण है कि कर्नल अजय कोठियाल भी इस सीट से चुनाव जीतना चाहते थे. हालांकि भाजपा से मिली हार के बाद उनके द्वारा खुद भी भाजपा का दामन थाम लिया गया. अब मां गंगा 2027 के चुनाव में किस दल को अपना आशीर्वाद देती है इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.
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