हरिद्वार जिले के भगवानपुर में बुग्गावाला पुलिस थाना क्षेत्र में एक पीड़ित 23 वर्षीय महिला की शिकायत पर उसके पति सहित पांच लोगों के खिलाफ समान नागरिक संहिता (UCC) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है.  पीड़ित महिला आठ महीने के एक बेटे की मां है. उसने अपने पति और ससुराल वालों पर शारीरिक हमले, दहेज उत्पीड़न और 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक' (एक ही बार में तीन तलाक) देने का आरोप लगाया है. उत्तराखंड में UCC लागू होने के बाद पहली बार हलाला प्रथा के खिलाफ FIR दर्ज होने का मामला सामने आया है.  इस मामले को UCC लागू होने के बाद एक अहम और ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है. 

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पीड़िता शाहिन ने पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया कि उसके पति मोहम्मद दानिश और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों ने उसे लंबे समय तक मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया. महिला का कहना है कि उस पर जबरन हलाला करने का दबाव बनाया गया. जब उसने इसका विरोध किया, तो उसे घर से बाहर निकाल दिया गया. इसके साथ ही महिला ने दहेज को लेकर भी लगातार उत्पीड़न का आरोप लगाया है.

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महिला ने तीन तलाक और हलाला का लगाया आरोप

पुलिस ने जानकारी दी कि महिला ने अपने पति पर ट्रिपल तलाक देने का आरोप लगाने के अलावा यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने अपने परिवार के आठ अन्य सदस्यों के साथ मिलकर उसे 'हलाला' के लिए मजबूर करने की कोशिश की. बता दें कि हलाला एक प्रतिबंधित प्रथा है, जिसमें ट्रिपल तलाक के बाद महिला को किसी दूसरे पुरुष से शादी करनी पड़ती है और उसके साथ हलाला पूरा होने के बाद ही वो उससे तलाक लेकर अपने पहले पति के पास वापस लौट सकती है. 

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल संज्ञान लेते हुए जांच शुरू कर दी. पुलिस ने पहले भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 115(2) और 85, मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 3 और 4, तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 3 और 4 के तहत भी आरोपियों के खिलाफ के तहत FIR दर्ज की थी.  हालांकि, जांच के दौरान पुलिस को हलाला और ट्रिपल तलाक से जुड़े आरोपों की गंभीरता का पता चला.

पुलिस ने UCC के तहत दर्ज किया पहला मामला

इसके बाद पुलिस ने उत्तराखंड समान नागरिक संहिता 2024 की धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii) को भी मामले से जोड़ दिया. इन धाराओं के तहत हलाला जैसी प्रथाओं को प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध माना गया है. यह प्रावधान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें कुरीतियों से मुक्त करने के उद्देश्य से जोड़ा गया है. पुलिस ने इन सभी धाराओं को जोड़ते हुए मामले को व्यापक रूप से दर्ज किया गया है, ताकि पीड़िता को न्याय दिलाया जा सके. इस तरह यह मामला देश का पहला ऐसा आपराधिक मामला बन गया है, जिसमें नए लागू हुए UCC ढांचे के तहत दंडात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल किया गया है.

महिला के भाई ने ससुराल पक्ष पर लगाए गंभीर आरोप

महिला के भाई ने मामले पर कहा, “मेरी बहन को उसके ससुराल वालों ने दहेज के लिए बार-बार परेशान किया और बुरी तरह पीटा.  उसके पति ने उसे अकेले में तीन तलाक दे दिया, और फिर उससे कहा कि अगर वह वापस आना चाहती है, तो उसे उसके द्वारा चुने गए किसी व्यक्ति के साथ हलाला करना होगा.” पीड़िता के भाई ने आगे कहा, “जैसे ही हमें इस बारे में पता चला, हम किसी तरह उसे उसके ससुराल से वापस ले आए और पुलिस से मिलकर पूरी जानकारी दी. हमारे लिए यह बहुत बड़ी राहत की बात है कि जांचकर्ताओं ने आरोपों को सही पाया.”

पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी मोहम्मद दानिश के अलावा मोहम्मद अरशद, परवेज, जावेद और गुलशाना को भी नामजद किया है. जांच की जिम्मेदारी उप निरीक्षक मनोज कुमार को सौंपी गई थी, जिन्होंने साक्ष्यों और बयानों के आधार पर जांच पूरी की. पुलिस ने अपनी विवेचना पूरी करने के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय, रुड़की की अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया है.

गौरतलब है कि उत्तराखंड में UCC लागू हुए करीब डेढ़ साल का समय बीत चुका है. इस दौरान हलाला और बहुविवाह जैसे मामलों में यह पहला मामला सामने आया है, जिसने कानून के प्रभाव और उसके उपयोग को स्पष्ट रूप से सामने रखा है. राज्य सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि UCC लागू होने के बाद महिलाओं को समान अधिकार और बेहतर कानूनी सुरक्षा मिली है.

UCC लागू होने के बाद प्रदेश में विवाह पंजीकरण बढ़ा

सरकार के आंकड़ों के अनुसार, UCC लागू होने के बाद विवाह पंजीकरण में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वर्तमान में राज्य में प्रतिदिन औसतन 1400 मैरिज रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं, जो पहले की तुलना में काफी अधिक है. पहले यह आंकड़ा करीब 67 प्रतिशत तक सीमित था, लेकिन अब इसमें तेजी से सुधार हुआ है. इस मामले को न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई से समाज में जागरूकता बढ़ेगी और महिलाओं के खिलाफ होने वाली कुरीतियों पर रोक लगेगी. वहीं, यह मामला आने वाले समय में यूसीसी के तहत दर्ज होने वाले अन्य मामलों के लिए एक मिसाल भी बन सकता है.

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