उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले प्रदेश की सियासत में दलबदल ने चुनावी समीकरणों को काफी बदल दिया है. कांग्रेस के कई पुराने और चुनाव लड़ चुके चेहरे भाजपा में जा चुके हैं, वहीं भाजपा के पूर्व विधायकों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं ने भी कांग्रेस का रुख किया है. ऐसे में इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहने वाला, बल्कि पहाड़ बनाम तराई और पुराने संगठन बनाम नए चेहरों का समीकरण भी चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है. दोनों पार्टियां अभी से संगठन और संभावित उम्मीदवारों को लेकर अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी हैं. 

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कांग्रेस के लिए उत्तरकाशी जिले का समीकरण खास तौर पर बदल गया है. 2022 में कांग्रेस के टिकट पर पुरोला से मालचंद, यमुनोत्री से दीपक बिजल्वाण और गंगोत्री से विजयपाल सिंह सजवाण चुनाव मैदान में थे. अब ये तीनों नेता भाजपा के साथ हैं. इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस इन तीनों सीटों पर चुनाव से बाहर हो गई है, लेकिन पार्टी को स्थानीय स्तर पर नए चेहरे तलाशने और दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे बढ़ाने की चुनौती जरूर है. 

पहाड़ी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, गांव-गांव का संपर्क और स्थानीय संगठन चुनाव में काफी मायने रखता है. ऐसे में कांग्रेस के लिए सिर्फ नया प्रत्याशी घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा, उसे उसके पीछे पूरा संगठन भी खड़ा करना पड़ेगा.

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करीब 20 सीटों पर कांग्रेस को नए समीकरण बनाने होंगे

दलबदल के बाद गढ़वाल से लेकर कुमाऊं और मैदानी क्षेत्रों तक कई सीटों पर कांग्रेस की पुरानी चुनावी तस्वीर बदल गई है. टिहरी में धन सिंह नेगी, धनौल्टी में जोत सिंह बिष्ट, पौड़ी में नवल किशोर, लैंसडाउन में अनुकृति गुसाईं रावत, चौबट्टाखाल में केसर सिंह नेगी, यमकेश्वर में शैलेंद्र रावत और बदरीनाथ में राजेंद्र भंडारी जैसे नाम अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं. 

मैदानी और कुमाऊं क्षेत्र में खानपुर, रुड़की, कालाढूंगी, रुद्रपुर, भीमताल, बागेश्वर और धर्मपुर जैसी सीटों पर भी पुराने समीकरण बदले हैं. डोईवाला में वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट के निधन के बाद पार्टी के सामने अलग तरह की नेतृत्व चुनौती खड़ी हुई है.

हालांकि इन सभी सीटों को कांग्रेस की कमजोर सीट मान लेना जल्दबाजी होगी. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बदलने के साथ समीकरण भी बदलते हैं. कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा काम यही है कि वह इन सीटों पर ऐसे स्थानीय चेहरे तलाशे जिनकी स्वीकार्यता सिर्फ पार्टी संगठन तक सीमित न हो, बल्कि जनता के बीच भी हो.

बदरीनाथ ने दिखाया, नेता बदलने से वोट नहीं बदलते

बदरीनाथ इस पूरे दलबदल के असर को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है. कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए राजेंद्र भंडारी को भाजपा ने 2024 के उपचुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया, लेकिन कांग्रेस के लखपत बुटोला ने उन्हें हरा दिया. इससे एक राजनीतिक संकेत साफ मिला कि किसी बड़े नेता का पार्टी बदलना अपने साथ पूरा वोट बैंक ले जाने की गारंटी नहीं है.

यही बात 2027 में भी दोनों दलों पर लागू होगी. कांग्रेस से भाजपा में गए नेताओं के सामने यह साबित करने की चुनौती होगी कि उनका व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी बदलने के बाद भी कायम है. दूसरी तरफ भाजपा से कांग्रेस में आए नेताओं को भी यही परीक्षा देनी होगी. यानी दलबदल के बाद असली ताकत का फैसला चुनाव मैदान में वोट से होगा, सिर्फ सदस्यता ग्रहण करने के मंच पर नहीं.

कांग्रेस ने भी भाजपा के कई पुराने चेहरों को जोड़ा

दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी 2027 से पहले भाजपा के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़कर पलटवार किया है. मार्च 2026 में भाजपा के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल और भीमलाल आर्य समेत छह नेता कांग्रेस में शामिल हुए. ठुकराल रुद्रपुर से दो बार विधायक रह चुके हैं, जबकि नारायण पाल और भीमलाल आर्य का भी अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक आधार रहा है. 

इन नेताओं के कांग्रेस में आने से खास तौर पर तराई और मैदानी सीटों पर नए समीकरण बने हैं. रुद्रपुर में राजकुमार ठुकराल की एंट्री को इसी नजरिए से देखा जा रहा है. वह भाजपा के पुराने चेहरे रहे हैं और अब कांग्रेस के साथ हैं. ऐसे में कांग्रेस पहाड़ में नए चेहरों की तलाश के साथ-साथ तराई में अनुभवी राजनीतिक चेहरों के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश करती दिखाई दे रही है.

तराई बनाम पहाड़ का एंगल क्यों महत्वपूर्ण?

2027 के चुनाव में तराई बनाम पहाड़ का राजनीतिक एंगल भी अहम हो सकता है. उत्तराखंड की पहाड़ी सीटों पर पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और आपदा जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं, जबकि तराई और मैदानी क्षेत्रों में उद्योग, कृषि, जमीन, रोजगार, शहरी विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों का असर अधिक दिखाई देता है.

ऐसे में दोनों पार्टियों के लिए एक जैसी रणनीति पूरे प्रदेश में काम नहीं करेगी. कांग्रेस के सामने पहाड़ में पुराने चेहरों के जाने के बाद नई लीडरशिप तैयार करने की चुनौती है, जबकि तराई में राजकुमार ठुकराल जैसे अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से वह भाजपा के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देने की कोशिश कर रही है. भाजपा के लिए स्थिति उलटी चुनौती वाली है—पहाड़ में कांग्रेस से आए नेताओं को समायोजित करना और तराई में अपने पुराने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नियंत्रित रखना.

भाजपा के लिए भी टिकट बंटवारा बनेगा अग्निपरीक्षा

कांग्रेस के नेताओं का भाजपा में जाना फिलहाल कांग्रेस के लिए नुकसान जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन भाजपा के सामने भी इसका दूसरा पहलू है. जिन सीटों पर कांग्रेस से आए नेता भाजपा में पहुंचे हैं, वहां पहले से भाजपा के पुराने दावेदार मौजूद हैं. वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता अगर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं और बाहर से आए नेता को टिकट मिलता है, तो असंतोष की स्थिति बन सकती है.

यही वजह है कि 2027 में दलबदल का सबसे बड़ा असर शायद टिकट बंटवारे के समय दिखाई देगा. दोनों दलों को तय करना होगा कि चुनाव जिताने की क्षमता के आधार पर नए चेहरे को प्राथमिकता दी जाए या पुराने कार्यकर्ता को. गलत संतुलन चुनाव से पहले ही बगावत की स्थिति पैदा कर सकता है.

कांग्रेस के सामने संगठन खड़ा करने की चुनौती

कांग्रेस के लिए सिर्फ बड़े नेताओं की वापसी या नए नेताओं का शामिल होना पर्याप्त नहीं होगा. पार्टी को इन नेताओं को बूथ स्तर के संगठन से जोड़ना होगा. खास तौर पर जिन पहाड़ी सीटों पर पुराने चुनावी चेहरे चले गए हैं, वहां समय रहते दूसरी पंक्ति तैयार करना जरूरी होगा.

कांग्रेस की चुनावी तैयारी को देखते हुए पार्टी संगठन में भी बदलाव कर रही है. वहीं भाजपा ने भी 2027 को लेकर बूथ स्तर पर अपनी तैयारी तेज की है और पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन में अनुशासन तथा एकजुटता पर जोर दिया जा रहा है. दोनों दलों की तैयारी बताती है कि चुनाव अभी दूर होने के बावजूद जमीन पर मुकाबला शुरू हो चुका है. 

2027 की लड़ाई में किसका दांव भारी?

पूरे घटनाक्रम को देखें तो फिलहाल दलबदल का असर कांग्रेस पर ज्यादा दिखाई देता है, क्योंकि उसके कई 2022 के चुनावी चेहरे अब भाजपा के साथ हैं. लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है. कांग्रेस ने भी भाजपा के पूर्व विधायकों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को अपने पाले में लाकर जवाब दिया है. बदरीनाथ जैसे उदाहरण बताते हैं कि किसी नेता की पार्टी बदलने से पूरा वोट बैंक अपने आप नहीं बदलता.

इसलिए 2027 में असली लड़ाई चेहरों से ज्यादा संगठन और वोट ट्रांसफर की होगी. पहाड़ में कांग्रेस कितनी जल्दी नए चेहरे तैयार करती है, तराई में राजकुमार ठुकराल जैसे नेताओं का कितना प्रभाव दिखाई देता है, भाजपा अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितना संतुष्ट रखती है और दोनों पार्टियां नए-पुराने नेताओं के बीच कितना संतुलन बना पाती हैं. इन सवालों के जवाब ही चुनावी नतीजों की दिशा तय करेंगे.

एक बात जरूर साफ है, 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता बनाम विपक्ष का मुकाबला नहीं होगा. इस बार पहाड़ की बदली हुई राजनीतिक जमीन और तराई के नए समीकरण, दोनों मिलकर उत्तराखंड की चुनावी कहानी लिखेंगे.

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