नवरात्र के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया, जिसमें पांच विधायकों को कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. इस विस्तार में राजपुर रोड से विधायक खजान दास ने सबसे पहले शपथ लेकर विशेष ध्यान आकर्षित किया. वह दूसरी बार मंत्री बने हैं और अपनी सरल व सहज कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं.

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शुक्रवार को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल ने खजान दास सहित सभी पांच नए मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. खजान दास का राजनीतिक सफर लंबा और अनुभवपूर्ण रहा है. उन्होंने पहली बार वर्ष 2007 में धनोल्टी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया था. इसके बाद उन्होंने देहरादून की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और वर्ष 2017 में राजपुर रोड सीट से जीत दर्ज की. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट से अपनी जीत दोहराई.

खजान दास इससे पहले रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व वाली सरकार में खेल, समाज कल्याण और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. वर्तमान में वह भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता के रूप में भी सक्रिय हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं.

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उनकी सबसे बड़ी पहचान उनका सरल स्वभाव और सहज व्यवहार है. राजनीतिक गलियारों में उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जो हर वर्ग से संवाद बनाए रखते हैं और बिना आक्रामकता के अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं. यही कारण है कि संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर उन्हें भरोसेमंद चेहरा माना जाता है.

सीएम धामी का क्षेत्रीय संतुलन साधने का भी प्रयास

कैबिनेट विस्तार के जरिए मुख्यमंत्री धामी ने क्षेत्रीय संतुलन साधने का भी प्रयास किया है. मंत्रिमंडल में मैदान और पहाड़ दोनों क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व दिया गया है. खास बात यह रही कि पहली बार हरिद्वार जिले को दो कैबिनेट मंत्री मिले हैं, जो क्षेत्रीय संतुलन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

गढ़वाल मंडल से आठ और कुमाऊं मंडल से चार मंत्री

वर्तमान कैबिनेट संरचना में गढ़वाल मंडल से आठ और कुमाऊं मंडल से चार मंत्री शामिल हैं. इनमें तीन विधायक पहली बार कैबिनेट मंत्री बने हैं, जबकि दो अनुभवी नेताओं को दोबारा मौका दिया गया है. इस संतुलन के जरिए सरकार ने अनुभव और नए चेहरों का संयोजन पेश करने की कोशिश की है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कैबिनेट विस्तार न केवल संगठनात्मक मजबूती का संकेत है, बल्कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की रणनीति का हिस्सा भी है.