उत्तराखंड के शहरी इलाकों में कूड़ा उठाने का तरीका अब बदलने वाला है. अब तक नगर निकायों में कूड़ा उठाने के लिए ज्यादातर डीजल से चलने वाले वाहन इस्तेमाल होते रहे हैं, जिनसे धुआं और शोर दोनों निकलते हैं. लेकिन अब शहरी विकास निदेशालय ने नई पहल करते हुए कई नए नगर निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का काम ई-वाहनों से कराने का फैसला लिया है. माना जा रहा है कि इससे न सिर्फ खर्च कम होगा बल्कि शहरों में प्रदूषण भी घटेगा.

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डीजल पर बढ़ता खर्च बना वजह

नगर निकायों के सामने सबसे बड़ी समस्या बजट की रहती है. सफाई व्यवस्था, कूड़ा उठान और कचरा प्रबंधन के लिए हर साल डीजल वाहनों पर काफी पैसा खर्च होता है. जब भी डीजल के दाम बढ़ते हैं तो इसका सीधा असर नगर निकायों के बजट पर पड़ता है. कई बार तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि ईंधन के पैसे नहीं होने की वजह से वाहन खड़े रह जाते हैं और सफाई व्यवस्था प्रभावित होती है.

इसी परेशानी को देखते हुए शहरी विकास विभाग ने फैसला किया है कि जहां नई नगर निकाय व्यवस्था शुरू हो रही है, वहां शुरुआत से ही ई-वाहनों का इस्तेमाल किया जाए ताकि भविष्य में डीजल के खर्च का बोझ कम किया जा सके.

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योजना के तहत शहरी विकास निदेशालय नए नगर निकायों के लिए कुल 80 ई-ट्रक और 49 ई-कार्ट्स खरीदेगा. इन वाहनों का इस्तेमाल शहरों से कूड़ा इकट्ठा करने और उसे निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाएगा.

इसके साथ ही इन वाहनों को चलाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा भी तैयार किया जाएगा. योजना में 25 ईवी चार्जिंग स्टेशन बनाने का भी प्रस्ताव है, ताकि वाहनों की चार्जिंग में कोई परेशानी न हो और सफाई व्यवस्था लगातार चलती रहे.

इन जिलों के नगर निकायों को मिलेगा फायदा

इस योजना का फायदा उत्तराखंड के कई नए नगर निकायों को मिलेगा. इसमें उधमसिंह नगर जिले के चार, हरिद्वार के पांच, देहरादून का एक, टिहरी का एक और अल्मोड़ा, बागेश्वर तथा पौड़ी के एक-एक नगर निकाय शामिल हैं.

इन जगहों पर कूड़ा उठाने की पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे ई-वाहनों के जरिए संचालित की जाएगी, जिससे सफाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया जा सके.

पहाड़ और मैदान के हिसाब से योजना

उत्तराखंड का भूगोल अलग-अलग तरह का है. एक तरफ हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिले हैं, जबकि दूसरी तरफ टिहरी, पौड़ी और बागेश्वर जैसे पहाड़ी इलाके हैं जहां सड़कें संकरी और ढलान वाली हैं.

इसी वजह से योजना बनाते समय इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि जहां ज्यादा चढ़ाई और कठिन रास्ते हैं, वहां डीजल वाहन ही दिए जाएंगे. जबकि मैदानी इलाकों में ई-वाहनों को प्राथमिकता दी जाएगी, क्योंकि वहां ये ज्यादा प्रभावी तरीके से काम कर सकते हैं.

शहरी विकास विभाग के सचिव नितेश झा का कहना है कि इस पहल का मकसद सिर्फ खर्च कम करना नहीं है, बल्कि पर्यावरण की जिम्मेदारी निभाना भी है. ई-वाहनों से धुआं नहीं निकलता और शोर भी कम होता है.

ऐसे में शहरों की सड़कों पर चलने वाली कूड़ा गाड़ियां अब पहले की तरह धुआं नहीं छोड़ेंगी. इससे हवा की गुणवत्ता बेहतर होगी और लोगों को साफ-सुथरा माहौल मिल सकेगा. सरकार को उम्मीद है कि यह पहल आगे चलकर राज्य के अन्य शहरों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है.