उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी इन दिनों बाहर से भले ही एकजुट दिखती हो, लेकिन अंदर से कुछ और ही चल रहा है. बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ बीजेपी नेता अजेंद्र अजय ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर जो बात कही, उसने पार्टी के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है.

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अजय ने अपनी पोस्ट में सीधे तो किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन बात साफ थी. उन्होंने लिखा कि बीजेपी अपना मूल स्वरूप और विचारधारा छोड़ती जा रही है. जो पार्टी कभी समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी कहलाती थी, उसमें अब उन्हीं लोगों को किनारे किया जा रहा है जिन्होंने दशकों तक जमीन पर काम किया. पोस्ट में उन्होंने यह भी लिखा कि मौजूदा हालात देखकर कई बार उनका मन राजनीति से संन्यास लेने का होता है.

पुराने कार्यकर्ताओं की पुरानी शिकायत

अजेंद्र अजय की यह नाराजगी अचानक नहीं आई. उत्तराखंड बीजेपी में यह असंतोष काफी समय से धीमी आंच पर पक रहा है. जो नेता और कार्यकर्ता पार्टी की नींव रखने में लगे रहे, बूथ स्तर पर काम किया, चुनावों में पसीना बहाया, उनमें से कई आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. टिकट बंटवारे से लेकर संगठन में पद देने तक, हर जगह यह सवाल उठता है कि पुराने लोगों को वह सम्मान मिल रहा है या नहीं जिसके वे हकदार हैं.

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प्रदेश अध्यक्ष का दो-टूक जवाब

जैसे ही यह पोस्ट सामने आई, प्रदेश अध्यक्ष ने कड़ा रुख अख्तियार किया. उन्होंने साफ कहा कि पार्टी के खिलाफ इस तरह की बातें सार्वजनिक मंचों पर रखना किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा. उनका यह भी कहना था कि जो व्यक्ति ऐसी सोच रखता हो, वह बीजेपी का कार्यकर्ता कहलाने का अधिकारी नहीं है.

अनुशासनात्मक कार्रवाई की आहट

इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि बीजेपी अजेंद्र अजय के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है. हालांकि अभी तक पार्टी की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया है. अगर कार्रवाई होती है, तो इसका संदेश दूसरे असंतुष्ट नेताओं तक भी जाएगा. और अगर नहीं होती, तो यह माना जाएगा कि पार्टी ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जो असल समस्या का हल नहीं है.

अजेंद्र अजय जैसे नेताओं की नाराजगी बीजेपी के लिए एक संकेत है. संगठन की ताकत हमेशा उसके जमीनी कार्यकर्ताओं से आती है. अगर वही लोग खुद को अनदेखा महसूस करने लगें, तो यह पार्टी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं.