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Uttarkashi News: उत्तरकाशी में है एशिया के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष की समाधि, दूर-दूर से आते हैं पर्यटक

Uttarkashi News In Hindi: जौनसार-बावर से सटे बंगाण क्षेत्र में, टौंस नदी वन प्रभाग के देवता रेंज के खूनीगाड़ के पास भासला बीट में, एशिया महाद्वीप के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष की समाधि स्थित है.

उत्तराखंड को देवभूमि कहते हैं और इस नाम की सार्थकता सिर्फ मंदिरों और तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं है. यहां की माटी में एक ऐसी संवेदनशीलता है जो पत्थर को भी पूजती है, नदी को भी मां मानती है. तो फिर एक ऐसे वृक्ष को भला कैसे भुलाया जा सकता था जो एशिया का सबसे ऊंचा चीड़ का वृक्ष था, जो दो सौ साल से ज्यादा तक इस धरती पर खड़ा रहा? उत्तराखंड ने नहीं भुलाया.

जौनसार-बावर से सटे बंगाण क्षेत्र में, टौंस नदी वन प्रभाग के देवता रेंज के खूनीगाड़ के पास भासला बीट में, एशिया महाद्वीप के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष की समाधि स्थित है. यह उत्तरकाशी जिले के पुरोला वन रेंज में है. यह समाधि पुरोला-त्यूनी मोटर मार्ग पर हनोल से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है. यानी अगर आप हनोल के प्रसिद्ध महासू देवता मंदिर के दर्शन करने जाते हैं, तो यह समाधि स्थल रास्ते में ही पड़ती है और एक बार दिख जाए तो बिना रुके जाना मुश्किल है.

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कितना विशाल था यह वृक्ष

चीड़ के इस महावृक्ष की लंबाई 60.65 मीटर से ज्यादा और चौड़ाई 2.70 मीटर थी. यानी करीब 200 फुट की ऊंचाई. एक छह मंजिला इमारत की कल्पना कीजिए उससे भी ऊंचा. वर्ष 1997 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इस पेड़ को महावृक्ष घोषित किया था. उस वक्त इसकी आयु लगभग 208 वर्ष थी यानी यह वृक्ष उस दौर से खड़ा था जब न भारत आजाद हुआ था, न उत्तराखंड राज्य बना था. 

वन विभाग ने घोषित किया था एशिया का सबसे ऊंचा चीड़ वृक्ष

टौंस और यमुना घाटी की इस वादी में यह वृक्ष किसी मीनार की तरह खड़ा था. दूर-दूर से लोग इसे देखने आते थे. वन विभाग ने इसे एशिया का सबसे ऊंचा चीड़ वृक्ष घोषित किया था यह उपाधि इस पेड़ की पहचान बन गई थी.

वह तूफानी रात जब एशिया का महावृक्ष धराशायी हुआ

8 मई 2007 को एक तेज तूफान के चलते यह पेड़ टूटकर गिर गया. जब सुबह लोगों ने देखा कि वह महाकाय वृक्ष जमीन पर पड़ा है, तो मानो मातम छा गया. स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक पेड़ का गिरना नहीं था यह एक युग का अंत था. जो पेड़ पुश्त-दर-पुश्त उनकी आंखों के सामने खड़ा था, वह एक रात में धूल में मिल गया. उत्तराखंड की वन संस्कृति और यहां के लोगों की प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता ने इस पेड़ को मरने नहीं दिया

वृक्ष को मिली समाधि - एक अनोखी परंपरा

पेड़ गिरने के बाद वन विभाग की तरफ से घोषित महावृक्ष की समाधि बनाई गई. इस बहुमूल्य धरोहर के संरक्षण के लिए वन विभाग की ओर से एक संग्रहालय भी बनाया गया, जहां चीड़ महावृक्ष के अवशेष रखे गए हैं. यह शायद देश का और संभवतः दुनिया का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां किसी वृक्ष की समाधि बनाई गई हो. आज यह चीड़ महावृक्ष समाधि स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है. इसके चारों तरफ पेड़-पौधों और हरियाली के साथ एक बगीचे का रूप दिया गया है.

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पर्यटन का एक नया आयाम

पर्यटक जब भी यमुना और टौंस घाटी की यात्रा पर पहुंचते हैं, तो एशिया के महावृक्ष की समाधि का दीदार जरूर करते हैं. यह जगह अब सिर्फ एक ऐतिहासिक वन स्थल नहीं रही यह एक भावनात्मक और आध्यात्मिक तीर्थस्थल बन गई है. हनोल का महासू देवता मंदिर इस क्षेत्र का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र है. उसी रास्ते पर यह समाधि पड़ती है. इसलिए इस पूरे क्षेत्र की यात्रा में महावृक्ष की समाधि के दर्शन करना एक अनिवार्य पड़ाव बन गया है.

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आलोक सेमवाल उत्तराखंड के देहरादून की खबरों पर नजर रखते हैं. एबीपी लाइव के लिए रिपोर्टिंग करते हैं. उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन BA hons मास कम्यूनिकेशन HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय से पूरी की हैं.

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