लोकसभा की 'अधूरी ख्वाहिश' विधानसभा चुनाव में पूरी करना चाहती है कांग्रेस! बार-बार BSP की ओर देख रही पार्टी
UP Politics: यूपी में चुनाव से पहले कांग्रेस अब एक बार फिर कोशिश में है कि बसपा के साथ उसका अलायंस हो. लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने ऐसी ही कोशिश की थी.

उत्तर प्रदेश की सियासत में बुधवार, 20 मई को उस वक्त हलचल मच गई जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राज्य इकाई के नेताओं के, बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के आवास पर पहुंचने की खबर आई. ये नेता मंगलवार शाम, 19 मई को बसपा चीफ के घर गए थे.
कांग्रेस नेताओं में यूपी स्थित बाराबंकी से सांसद तनुज पूनिया भी शामिल थे. इसके अलावा यूपी इकाई के एससी विभाग के नेता राजेंद्र पाल गौतम भी, मायावती से मिलने पहुंचे थे. हालांकि इन नेताओं की मुलाकात नहीं हो पाई और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें बैरंग लौटा दिया. कांग्रेस नेताओं से कहा गया कि वह समय लेकर बसपा चीफ से मिलने आएं.
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वह यूपी की पूर्व सीएम मायावती का हालचाल जानने के लिए गए थे. वहीं दूसरी ओर चर्चा है कि कांग्रेस के नेता बसपा चीफ से मिलने इसलिए पहुंचे थे ताकि वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली सांसद राहुल गांधी का संदेश पहुंचा सकें. हालांकि बाराबंकी सांसद तनुज पूनिया ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है.
अब बात चाहे जो भी हो लेकिन यूपी की सियासत के लिहाज से यह बड़ा घटनाक्रम है. चुनावी साल में बसपा चीफ के घर कांग्रेस नेताओं का यूं पहुंचना बिना सियासी निहितार्थ के हो, यह लगभग असंभव है. राजनीतिक जानकारों की मानें तो कांग्रेस, लोकसभा चुनाव की अपनी अधूरी ख्वाहिश, विधानसभा चुनाव में पूरी करना चाहती है.
लोकसभा की अधूरी ख्वाहिश और कांग्रेस...
दरअसल, लोकसभा चुनाव के दौरान कई मौकों यह जानकारी सामने आई कि कांग्रेस यह चाहती थी कि बसपा, इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस यानी इंडिया अलायंस के परचम चले सपा के साथ लोकसभा चुनाव लड़े.
अब सवाल यह भी उठ रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में 6 सीट जीतने वाली कांग्रेस, आखिर अभी भी बसपा की ओर क्यों देख रही है तो इसकी तीन वजहें सामने आती हैं-
पहला- उत्तर प्रदेश में दलित वोट लंबे समय तक बीएसपी की सबसे बड़ी ताकत रहे हैं. हालांकि पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी ने भी दलित वोटों में अच्छी पैठ बनाई है. कांग्रेस को लगता है कि अगर वह मायावती के प्रति नरम रुख दिखाती है, तो दलित समाज में अपने लिए जगह बना सकती है.
दूसरी वजह यह है कि कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह बीजेपी विरोधी राजनीति में किसी भी बड़े दल को साथ लेने के लिए तैयार है. मायावती का जिक्र कर कांग्रेस यह संकेत भी दे रही है कि वह बीएसपी के लिए राजनीतिक दरवाजे बंद नहीं करना चाहती.
तीसरी वजह- राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस बीएसपी का नाम लेकर समाजवादी पार्टी पर भी दबाव बनाना चाहती है. लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस खुद को कमजोर स्थिति में मानती रही. ऐसे में बीएसपी का विकल्प जिंदा रखकर वह भविष्य की सौदेबाजी मजबूत करना चाहती है.
अब आइए साल 2023 से 2024 के उस दौर की बात करते हैं जहां मायावती ने न सिर्फ गठबंधन की किसी संभावना को खारिज किया बल्कि कांग्रेस को भी अपने अंदाज में दो टूक जवाब दे दिया था.
साल 2023 की जुलाई में एक प्रेस वार्ता के दौरान बसपा प्रमुख ने INDIA और NDA गठबंधन पर भी सवाल उठाए थे. उन्होंने कांग्रेस के वादों को 'खोखला' बताते हुए कहा था कि यह पुरानी पार्टी सिर्फ़ सत्ता में आने के लिए गठबंधन कर रही है.
लोकसभा चुनाव के ऐलान से ठीक दो महीने बसपा चीफ ने जनवरी में 15 तारीख को अपने जन्मदिन पर एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था- अपने इस अनुभव को खास ध्यान में रखकर, हमारी पार्टी लोकसभा के यह आमचुनाव अकेले ही लड़ेगी तथा देश की जातिवादी, पूंजीवादी, संकीर्ण व सांप्रदायिक सोच रखने वाली सभी पार्टियों से अपनी दूरी भी बना कर रखेगी. हमारी पार्टी किसी भी गठबंधन व पार्टी के साथ मिलकर यह चुनाव नहीं लड़ेगी. हमारी पार्टी, लोकसभा के आमचुनाव अकेले ही लड़कर अपना बेहतर रिजल्ट जरूर लायेगी. हमारी पार्टी गठबंधन ना करके अकेले ही चुनाव इसलिए लड़ती है, क्योंकि इस पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्त्व एक दलित के हाथ में है जिनके प्रति अधिकांशः पार्टियों की जातिवादी मानसिकता अभी तक भी नहीं बदली है. यही मुख्य वजह है कि गठबंधन करके चुनाव लड़ने में बीएसपी का वोट तो गठबन्धन से जुड़ी पार्टी को पूरा चला जाता है, लेकिन उनका अपना बेस वोट व विशेषकर अपरकास्ट समाज का वोट, बी.एस.पी. को ट्रांसफर नहीं हो पाता है.
राहुल गांधी ने बसपा के साथ पर क्या कहा था?
गौरतलब है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव संपन्न होने के कुछ महीनों बाद फरवरी 2025 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम में कहा था- बहन जी आजकल चुनाव ठीक से क्यों नहीं लड़ रहीं हैं. हम चाहते थे कि बहन जी बीजेपी के विरोध में हमारे साथ लड़ें. मगर मायावती किसी न किसी कारण नहीं लड़ीं. अगर तीनों पार्टियां (सपा, बसपा, कांग्रेस) एक साथ हो जातीं तो बीजेपी कभी नहीं जीतती.
इतना ही नहीं बीते दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्राओं से बातचीत के क्रम में राहुल गांधी ने मायावती की तारीफ की थी. 26 अप्रैल को जारी एक वीडियो में राहुल गांधी ने छात्राओं में से एक के सवाल का जवाब देते हुए कहा- मैं उनका राजनीतिक विरोधी हूं, लेकिन मेरा मानना है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने जो कई काम किए, उनसे मुझे असहमति है. जिस तरह उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाया, उससे भी मुझे कुछ दिक्कतें हैं. लेकिन मुझे लगता है कि वह बहुत साहसी और काफी प्रभावशाली नेता थीं, जब तक कि उन्होंने खुद पीछे हटने का फैसला नहीं किया. वह अलग मुद्दा है. मेरा मानना है कि उन्होंने कई वर्षों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा को बुनियादी तौर पर बदल दिया.
राहुल के बयान पर क्या बोली थी बसपा?
राहुल गांधी की बातचीत का यह वीडियो सामने आने के बाद बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा था कि जिसने अच्छा काम किया है, उसकी तारीफ होना स्वाभाविक है. उन्होंने कहा कि मायावती आज भी सबसे मजबूत नेता हैं. उनके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था कैसी थी, यह पूरा प्रदेश जानता है. उस समय पेपर लीक जैसी घटनाएं नहीं होती थीं, यह भी सबने देखा है. विश्वनाथ पाल ने कहा कि प्रशासन चलाने के मामले में मायावती से बेहतर कोई नहीं है और जो अच्छा काम करेगा, लोग उसकी सराहना जरूर करेंगे.
अब फिर साल 2026 की 19 मई को हुए घटनाक्रम की बात करते हैं. यह खबर आते ही कि कांग्रेस नेता बसपा चीफ के घर पहुंचे हैं सियासत में हलचल आ गई.
क्या बोली कांग्रेस?
इस घटनाक्रम पर कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने कहा कि यूपी में बदलाव तय है. सभी राजनीतिक दलों को एक साथ आना चाहिए. बंगाल का हश्र सबने देख लिया. कांग्रेस ही बीजेपी के साथ आंख में आंख मिलाकर लड़ सकती है.
यह पूछे जाने पर कि अगर कांग्रेस, बसपा को साथ लाने में कामयाब होती है तो क्या सपा इसमें कंफर्ट महसूस करेगी, अवस्थी ने कहा कि यहां किसी के स्वार्थ और लाभ की बात नहीं है. तीनों पार्टियां, संविधान में आस्था रखने वालीं हैं. साल 2024 के चुनाव में सभी ने देखा कि कैसे यूपी में बीजेपी, पिछड़ गई. 2027 में भी अगर सब साथ आएंगे तो परिणाम अलग होंगे.
बसपा अभी खामोश!
BSP के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि उन्हें इस दौरे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. उन्होंने बताया, 'मुझे नहीं पता कि बहन जी से मिलने कौन गया था. मुझे ऐसे किसी दौरे के बारे में कोई जानकारी नहीं है.'
इन सबके बीच कांग्रेस ने मायावती के घर पहुंचे सभी नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. यूपी कांग्रेस चीफ अजय राय ने कहा है कि बसपा चीफ के घर जाने की अनुमति नहीं ली गई थी. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जो ख्वाहिश अधूरी रह गई थी, क्या वह विधानसभा चुनाव में पूरी हो पाएगी या कांग्रेस नेताओं का यह दौरा सिर्फ हालचाल जानने तक ही सीमित दिखता रहेगा.

























