उत्तराखंड के देहरादून में शुक्रवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने गुरुवार को एक प्रेस वार्ता कर उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता (UCC) और मदरसा शिक्षा में किए गए बदलावों पर कड़ा विरोध जताया. बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सय्यद कासिम ने ABP न्यूज से खास बातचीत में साफ कहा कि ये दोनों कदम संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं और सरकार को इन पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए.

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डॉ. कासिम ने कहा कि भारत एक बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश है जहां हर समुदाय को अपने पर्सनल लॉ के तहत जीने का संवैधानिक अधिकार है. UCC इस अधिकार को सीधे कुचलता है. उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं. UCC उसी गारंटी पर प्रहार है. बोर्ड की मांग है कि सरकार किसी भी समुदाय पर उसकी सहमति के बिना ऐसा कानून न थोपे और इस मुद्दे पर व्यापक सर्वदलीय और सामुदायिक संवाद हो.

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मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला भी निशाने पर

प्रेस वार्ता में मदरसा शिक्षा का मुद्दा भी जोरदार तरीके से उठा. बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार के उस फैसले पर नाराजगी जताई जिसके तहत 1 जुलाई 2026 से प्रदेश में मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त किया जा रहा है. डॉ. कासिम ने कहा कि मदरसे सिर्फ धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं हैं. ये गरीब मुस्लिम परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा का एकमात्र सहारा हैं. इन्हें अचानक बंद करने या पूरी तरह बदल देने से हजारों बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाएगा.

उत्तराखंड में UCC -क्या बदला है?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता लागू की. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने 2024 में विधानसभा में यह विधेयक पास कराया और 2025 में इसे लागू किया. इसके तहत विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार में अब सभी धर्मों के लिए एक समान कानून लागू होगा. मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक और बहुविवाह की व्यवस्था अब कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी. हर विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण होगा. लिव-इन रिलेशनशिप को भी पंजीकृत कराना अनिवार्य किया गया है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई विपक्षी दलों का कहना है कि यह कानून अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वायत्तता पर सीधा हमला है.

मदरसा बोर्ड में क्या बदलाव हुए?

उत्तराखंड सरकार ने 2025 में अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू किया है जिसके तहत 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड भंग हो जाएगा. प्रदेश के सभी 452 पंजीकृत मदरसों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से संबद्धता लेनी होगी. उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता अनिवार्य होगी. पाठ्यक्रम में बदलाव कर मुख्यधारा की शिक्षा को अनिवार्य किया जाएगा.

सरकार का तर्क है कि इससे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलेगी और वे मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे. लेकिन मुस्लिम संगठनों का कहना है कि इससे धार्मिक शिक्षा की जड़ें कमजोर होंगी और समुदाय की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ेगी.

अब आगे क्या?

AIMPLB ने संकेत दिया है कि अगर सरकार ने इन मुद्दों पर संवाद नहीं किया तो बोर्ड कानूनी और संवैधानिक रास्ते अपनाने से नहीं हिचकेगा. मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है. फिलहाल उत्तराखंड में UCC और मदरसा बोर्ड के बदलाव एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुके हैं. एक तरफ सरकार एकरूपता और पारदर्शिता की दलील दे रही है, दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय पहचान और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है.

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