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Xप्लेन: UP में सपा-कांग्रेस का हथियार बनेगा UCC! लेकिन कैसे? पढ़ें 5 बड़े फैक्टर

BJP के पास UCC का मुद्दा है, लेकिन UP में इसे लागू करना उसके लिए राजनीतिक जोखिम भी है. 19% से ज्यादा मुस्लिम आबादी और 80 से ज्यादा सीटों पर उनका असर BJP के लिए UCC को दोधारी तलवार बनाता है.

गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को ऐलान किया कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू कर दिया जाएगा. इसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई, क्योंकि UP में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं और यहां देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है. यहां एक ट्विस्ट है. UP की विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, BJP के लिए UCC किसी हथियार की तरह काम करने के बजाय विपक्ष के हाथ में थमा हुआ तगड़ा मुद्दा बन सकता है. लेकिन कैसे?

विपक्ष को कहां से मिलेगा फायदा?

राजनीतिक विशेषज्ञ रशीद किदवई और CSDS के संजय कुमार 5 बड़े फैक्टर बताते हैं...

फैक्टर-1: 'जनसंख्या जितनी बड़ी, सियासी असर उतना गहरा'

UP में मुस्लिम आबादी 19% से ज्यादा है, लेकिन सियासी असर सिर्फ उस आबादी से कहीं बड़ा है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल मुस्लिम-दलित-पिछड़ा गठजोड़ पर टिके हैं. UCC का मुद्दा इस गठजोड़ को मजबूत करने का काम करता है, क्योंकि यह मुस्लिम समुदाय को एकजुट करने का सबसे सीधा जरिया बन जाता है.

अखिलेश यादव ने अमित शाह के बयान के तुरंत बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'UCC का मतलब Underground Communal Conspiracy.' यानी UCC का नया फुलफॉर्म बताकर उन्होंने सीधे BJP पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाया.

यह सिर्फ एक बयान नहीं, यह पूरी चुनावी रणनीति का संकेत है. अखिलेश का प्लान है कि UCC को सांप्रदायिक मुद्दा बनाकर मुस्लिम और पिछड़ा वोटर को अपने पक्ष में एकजुट करना.

फैक्टर-2: मुस्लिम वोट का बंटवारा या एकजुटता?

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी UCC का कड़ा विरोध किया है. भोपाल में उन्होंने साफ कहा कि ऐसा कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 29 का उल्लंघन करता है. यहीं असली खेल है.

ओवैसी का विरोध BJP के लिए दोधारी तलवार है. UP में AIMIM कई सीटों पर मुस्लिम वोट काट सकती है, जिससे SP और कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. अगर UCC का मुद्दा इतना भावुक हो जाए कि मुस्लिम वोटर एकजुट होकर सिर्फ एक विकल्प की तरफ देखें, तो AIMIM का प्रभाव कम हो सकता है. यही वजह है कि ओवैसी के बयानों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है. वे BJP को घेरने के लिए हैं, लेकिन साथ ही SP-कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने का मौका भी तलाशते हैं.

फैक्टर-3: NDA के भीतर ही टूट की आवाज

यह BJP के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है. UCC के मुद्दे पर NDA के अपने सहयोगी दलों ने अलग-अलग रुख अपना लिए हैं.

  • तटस्थ/विरोधी रुख: JD(U) ने साफ कह दिया है कि वह बिहार में UCC लागू नहीं होने देगी. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि वे गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर इस मुद्दे पर बात करेंगे. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले UCC के विचार का समर्थन किया था, लेकिन इस बात पर जोर दिया था कि सभी समुदायों को साथ लेकर आम सहमति बनाई जानी चाहिए.
  • सतर्क रुख: लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी सतर्कता दिखाते हुए कहा है कि उनकी पार्टी एकरूपता और सामाजिक न्याय दोनों को ध्यान में रखेगी.
  • समर्थन में: TDP, शिंदे गुट की शिवसेना और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) ने UCC के समर्थन की बात कही है.

लेकिन JD(U) का साफ विरोध और TDP-LJP की सतर्कता यह बताती है कि NDA के भीतर भी इस मुद्दे पर सहमति नहीं है. जब गठबंधन के सहयोगी ही साथ नहीं हैं, तो विपक्ष के लिए यह सुनहरा मौका है. वह इस फूट को उठाकर BJP को घेर सकता है.

फैक्टर-4: कानूनी रुकावटें भी बनेंगी हथियार

उत्तराखंड में UCC लागू होने के बाद से ही मुस्लिम संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में UCC कानून के खिलाफ याचिका दायर की है. इसमें तर्क दिया गया है कि यह कानून अल्पसंख्यकों के रीति-रिवाजों को अनदेखा करता है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. कई जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है.

यह विपक्ष के लिए दोहरा फायदा है. एक तरफ, लंबी कानूनी प्रक्रिया UCC को लटकाए रखती है, तो दूसरी तरफ अदालती लड़ाई विपक्ष को एक ऐसा प्लेटफॉर्म देती है जहां वह अपनी बात लगातार जनता तक पहुंचा सकता है.

फैक्टर-5: महिलाओं के मुद्दे पर BJP का दावा कितना मजबूत?

BJP और उसके सहयोगी लगातार यह प्रचार कर रहे हैं कि UCC से महिलाओं को सबसे ज्यादा फायदा होगा. कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने UCC का समर्थन करते हुए कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर इस्तीफा दिया था. UCC महिलाओं को बहुविवाह, हलाला, तीन तलाक और बाल विवाह जैसी कुरीतियों से मुक्ति दिलाएगा.

हालांकि, विपक्ष इस दावे को भी तोड़ सकता है. सामाजिक और कानूनी एक्सपर्ट्स का एक बड़ा वर्ग मानता है कि UCC का असली मकसद महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि हिंदू बहुसंख्यकवाद को मजबूत करना है.

राजनीतिक विशेषज्ञ रशीद किदवई ने उत्तराखंड के UCC प्रावधानों को पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण बताया है और कहा है कि यह राज्य को पीछे की ओर धकेल सकता है. विपक्ष यह तर्क उठा सकता है कि अगर सरकार को महिलाओं की सच में चिंता है, तो उसे पहले घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और समान वेतन जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.

तो फिर विपक्ष के हथियार कैसे काम करेंगे?

रशीद किदवई के मुताबिक, विपक्ष का हथियार 5 तरह से काम आ सकता है...

1. अखिलेश का 'पिछले वादे पहले' वाला दांव

अखिलेश यादवकी रणनीति सबसे साफ और सबसे कारगर दिख रही है. अखिलेश ने UCC को सीधे तौर पर खारिज करने के बजाय रुख अपनाया है कि पहले सरकार पुराने वादे पूरे करे.

2. कांग्रेस का कानूनी और संवैधानिक हमला

कांग्रेस ने UCC को संविधान के अनुच्छेद 25 और 29 का उल्लंघन बताया है. नेता प्रतिपक्ष धीरेंद्र यादव ने साफ कहा है कि यह विधेयक नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने तो यहां तक ऐलान कर दिया कि 2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो UCC को 'काला कानून' कहकर खत्म कर दिया जाएगा.

3. छोटे दलों और क्षेत्रीय पार्टियों का समीकरण

UP में कई क्षेत्रीय दल हैं जो अपनी-अपनी जाति और समुदाय की राजनीति करते हैं. UCC का मुद्दा इन सबको एक प्लेटफॉर्म पर ला सकता है. जब BJP सभी को एक कानून के तहत लाने की बात करती है, तो यह उन समुदायों के लिए खतरे की घंटी है, जिनके अपने अलग रीति-रिवाज हैं.

2027 के चुनावों में बीजेपी की गले की फांस बनेगा?

UP में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं. अगर BJP UCC को लेकर कोई ठोस कदम उठाती है, तो यह सीधे चुनावी मुद्दा बन जाएगा. अगर वह इसे लटकाती रही, तो विपक्ष कह सकता है कि BJP सिर्फ वोट के लिए मुद्दा उठाती है, लागू नहीं करती.

राजनीतिक विश्लेषक और द फेडरल के रिपोर्टर पुनीत निकोलस यादव ने अपने विश्लेषण में लिखा है कि अमित शाह का UCC पर जोर UP में वोटरों को ध्रुवीकृत करने और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है. निकोलस ने यह भी कहा कि राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने की रणनीति विपक्ष के एकजुट विरोध को रोकने के लिए है.

CPI(M) ने कहा, 'UCC को पूरे देश में लागू करने का प्रस्ताव अगले आम चुनाव से पहले BJP के हिंदुत्व समर्थक आधार को मजबूत करने की एक स्पष्ट राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है.'

UP चुनाव 2027 में किसे क्या मिलेगा?

एक्सपर्ट्स का मानना है,

  • BJP को क्या मिलेगा: BJP अपने हिंदुत्व वोट बैंक को यह संदेश दे सकती है कि वह राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के बाद अपना तीसरा बड़ा वादा पूरा कर रही है. UCC BJP के तीन कोर एजेंडों में से एक है. यहां एक बड़ी दिक्कत है कि UP में BJP का हिंदू वोट बैंक पहले से ही मजबूत है. UCC से उसे नया वोट बैंक नहीं मिलेगा, बल्कि पुराना बरकरार रहेगा.
  • विपक्ष को क्या मिलेगा: SP और कांग्रेस के लिए UCC एक ऐसा मुद्दा है जो उनके कोर वोट बैंक को एकजुट कर सकता है. UCC का विरोध करके वे इन समुदायों को यह संदेश दे सकते हैं कि BJP उनकी परंपराओं और रीति-रिवाजों पर हमला कर रही है. यह सीधा और साफ संदेश है जो वोटरों तक आसानी से पहुंचता है.
  • छोटे दलों को क्या मिलेगा: UP में कई ऐसी जातियां और समुदाय हैं जिनके अपने पर्सनल लॉ या रीति-रिवाज हैं. UCC से छोटे दलों को अपनी पहचान बनाने का मौका मिल सकता है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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