रामपुर: मशहूर शायर ताहिर फराज़ का निधन, मुंबई में ली आखिरी सांस, प्रशसंकों में शोक की लहर
Tahir Faraz Passes Away: अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उर्दू शायर ताहिर फ़राज़ का 72 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया है. उनकी मखमली आवाज़ और रूहानी शायरी ने करोड़ों दिलों पर राज किया.

उर्दू अदब की दुनिया के लिए एक युग का अंत हो गया है. अपनी मखमली आवाज़ और रूहानी शायरी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर ताहिर फ़राज़ का शनिवार को मुंबई में निधन हो गया. वे 72 वर्ष के थे. उनके निधन की खबर फैलते ही रामपुर से लेकर पूरी दुनिया में मौजूद उनके चाहने वालों और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.
मिली जानकारी के अनुसार, ताहिर फ़राज़ पिछले कुछ दिनों से परिवार के साथ मुंबई में थे. वे वहां एक निकाह समारोह में शामिल होने और अपनी बेटी के ऑपरेशन के सिलसिले में रुके हुए थे. शनिवार सुबह अचानक उनके सीने में तेज दर्द हुआ. उन्हें तत्काल नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. उनके परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और एक बेटा है. उनका अंतिम संस्कार मुंबई में ही किया जाएगा.
बदायूं में जन्म, रामपुर में संवरी शायरी
29 जून 1953 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे ताहिर फ़राज़ का बचपन से ही शायरी से गहरा नाता था. उनके पिता भी नशिस्तों (गोष्ठियों) में जाते थे, जहाँ नन्हे ताहिर उनकी ग़ज़लों को तरन्नुम में सुनाया करते थे. मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल कह दी थी. इंटरमीडिएट के बाद वे अपने ननिहाल रामपुर आ गए और यहीं के होकर रह गए. रामपुर में उन्हें डॉ. शौक़ असरी और दिवाकर राही जैसे दिग्गजों का सानिध्य मिला, जिससे उनके फन में निखार आया.
'काश ऐसा कोई मंज़र होता' से मिली वैश्विक पहचान
ताहिर फ़राज़ केवल एक शायर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन गीतकार और 'ब्रांड' थे. उनकी ग़ज़ल के शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं:
"काश ऐसा कोई मंज़र होता,
मेरे कांधे पे तेरा सर होता"
उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, यूएई, सऊदी अरब, पाकिस्तान और कुवैत सहित दर्जनों देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया. उनकी आवाज़ का जादू ऐसा था कि टी-सीरीज जैसी बड़ी कंपनियों ने उनके एलबम रिकॉर्ड किए.
साहित्यिक जगत की प्रतिक्रिया
सौलत पब्लिक लाइब्रेरी के पूर्व सदस्य काशिफ खां ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, "ताहिर फ़राज़ का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उर्दू शायरी के एक सुनहरे अध्याय का अंत है. वे रामपुर की उस गौरवशाली परंपरा के वाहक थे, जहाँ ग़ालिब और दाग़ जैसे दिग्गजों के पदचिह्न हैं. उनके जाने से शब्द अनाथ हो गए हैं."
एक नज़र में ताहिर फ़राज़ का सफरa
| विवरण | जानकारी |
| जन्म | 29 जून 1953, बदायूं (यूपी) |
| शिक्षा | एम.ए. (उर्दू), रूहेलखंड यूनिवर्सिटी |
| मुख्य प्रभाव | बशीर बद्र की शायरी |
| विशेषता | मधुर तरन्नुम, आध्यात्मिक गहराई, गंगा-जमुनी तहजीब |
| लोकप्रिय रचनाएँ | 'काश ऐसा कोई मंज़र होता', 'दुआएं', नात और मनक़बत |
ताहिर फ़राज़ का खानक़ाह नियाज़िया (बरेली) से भी गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता था. उनके निधन से आज उर्दू मुशायरों का मंच सूना हो गया है.
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