गोरखपुर, एबीपी गंगा। उन्हें संस्कृत के मौलाना कहें, तो कोई गुरेज नहीं होगा। वेद पर रिसर्च और 32 साल तक गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग में अध्यापन कर संस्कृत की सेवा की। विभागाध्यक्ष रहते हुए साल 2011 में सेवानिवत्ति ली। उनके पढ़ाये हुए कई शिष्य आज संस्कृत के विद्वान भी हैं। हम बात कर रहे हैं प्रो. असहाब अली की। जिन्होंने बीएचयू की घटना पर न सिर्फ खेद जताया है. बल्कि, कहा कि संस्कृत भाषा को किसी धर्म से जोड़कर देखना गलत है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राकृत भाषा के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. असहाब अली बीएचयू में संस्कृत पढ़ाने के लिए मुसलमान की नियुक्ति के विरोध पर अचंभित हैं। भाषा को धर्म या जाति से जोड़ने वालों को उन्होंने यह कहते हुए कठघरे में खड़ा किया कि दरअसल, ये वे लोग हैं, जिन्हें वेद और कुरान के साथ भारतीय संस्कृति के बारे में रत्तीभर भी नहीं पता। जिन्हें भारतीय संस्कृति की समझ है, वह इस तरह के विरोध कदापि नहीं करते। प्रो. अली ने खुद का उदाहरण देते हुए कहा कि जब 1977 में वे गोरखपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुए तो विवि परिसर से लेकर हर समाज ने केवल मेरा शिक्षण कौशल देखा, विद्वता देखी और विद्यार्थियों के प्रति मेरा अनुराग देखा।
किसी ने मेरा मजहब नहीं पूछा। इसे मेरी काबिलियत समझी गई। 2011 तक वे विश्वविद्यालय में रहे। लेकिन, कभी उन्हें किसी तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। मेरे शिष्य हर समुदाय थे और अब भी मेरा सम्मान संस्कृत मर्मज्ञ के रूप में करते हैं। वह बताते हैं कि जब वह यहां आए थे, तो उनकी पोशाक धोती-कुर्ता थी। 1997 में हज यात्रा के बाद उनकी पोशाक बदलकर पाजामा-कुर्ता हो गई। इसके बाद भी विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच उनकी लोकप्रियता में रत्तीभर भी कमी नहीं आई। प्रो. अली ने कहा कि अब तक हमने यही देखा है कि कोई मुसलमान यदि संस्कृत का प्रकांड विद्वान बन जाए, तो कोई हिन्दू अगर उर्दू का विद्वान हो जाए ऐसे लोगों का सम्मान सभी की नजर में थोड़ा अधिक हो जाता है। बीएचयू में पहली बार कुछ लोगों को ऐसे इंसान का विरोध करते सुन रहा हूं। जबकि बीएचयू प्रशासन ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है. जिसका चयन हुआ है, उसकी विद्वता और शिक्षण शैली के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए। जाति या धर्म के आधार पर नहीं।
प्रो. असहाब को वेद और कुरान दोनों में महारथ हासिल है। वह कहते हैं कि वेद दुनिया के अति प्राचीन ग्रंथ हैं। इसमें भी ऋग्वेद अति प्राचीन है। कुरान सबसे बाद का ग्रंथ है। उन्होंने जितनी शिद्दत से इन दोनों ग्रंथों का अध्ययन किया, उतनी ही शिद्दत से कक्षाएं भी लेते रहे। यही वजह रही कि हमेशा कक्षाएं भरी रहती थीं। गोरखपुर विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष बनने वाले वे पहले मुसलमान थे। प्रोफेसर असहाब अली 2011 के जून महीने में रिटायर हुए हैं। प्रो असहाब अली का कहना है कि बीएचयू में जो छात्र विरोध कर रहे हैं, वो गलत कर रहे हैं। किसी भी अध्यापक को क्लास के अंदर जज किया जाता है न कि बाहर। जाति, धर्म और मजहब के हिसाब से जज करना तो बिल्कुल गलत है।
प्रोफेसर असहाब अली ने इंटरमीडिएट परीक्षा में संस्कृत में टॉप किया था। इसके बाद उन्होंने ग्रेजुएशन संस्कृत में किया और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन में उनका स्पेशलाइजेशन वेदों पर रहा है। पीएचडी उन्होंने वैदिक और इस्लामिक मिथकों के तुलनात्मक अध्यन पर किया है। प्रोफेसर असहाब अली मूल रूप से महराजगंज के जमुनिया गांव के रहने वाले हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय में वो 1973 से ही रिसर्च के दौरान छात्रों को पढ़ाने लगे थे। 1977 में उनको नियुक्ति मिल गई. तब से लेकर 2011 तक वह विश्वविद्यालय में छात्रों को संस्कृत की शिक्षा देते रहे. रिटायरमेंट के समय प्रोफेसर असहाब संस्कृत विभाग के एचओडी थे.
साथ ही उन्होंने कहा कि उनके विद्यार्थी जीवन में और उनके टीचर रहते हुए कभी भी ऐसी बात नहीं आई कि मुसलमान संस्कृत से जुड़ा हुआ है, तो एक बुरी बात हो गयी। बल्कि इसमें मुझको प्रोत्साहित ही किया जाता रहा है। वह कहते हैं कि लोग मुझे उत्साहित करते थे और ये उत्साहवर्द्धन तब और हुआ जब मैं अध्यापक हो गया। विवि में छह साल तक असिस्टेंट प्रॉक्टर रहा। विवि के सभी अध्यापकों को मैं जानता रहा हूं। सबसे मित्रवत और बड़े लोगों से मैं गुरुवत मिलता रहा है। संस्कृत से जुड़ाव के मुद्दे पर प्रो. असहाब अली कहते हैं कि ने कहा कि मैं धर्म के प्रति बड़ा प्रतिबद्ध हूं। मैं हाईस्कूल में जब पढ़ रहा था, तभी रामायण महाभारत, सुखसागर, विश्रामसागर सब वे पढ़ चुका था।
हिन्दू माइथालजी में जितनी कहानियां थीं, उसमें मैं पारगंत रहा हूं। कोई बात किसी को खटकती रही है, तो वो मुझसे पूछ लेता। तब मेरे गुरु द्विवेदी जी ने कहा कि इसका मूल संस्कृत में है, तब वे संस्कृत पढ़ने लगा। इंटर में मैंने संस्कृत लिया, जिस कॉलेज में मैंने संस्कृत लिया 24 सालों में वहां कोई रिकार्ड नहीं तोड़ पाया था। मैं पहला था जिसने प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए रिकॉर्ड तोड़ दिया। तब एक पर्चा छपा था, जिसमें लिखा था कि असहाब अली ने रिकॉर्ड तोड़ दिया, मोटे अच्छरों में लिखा था। मुसलमान होकर भी संस्कृत में टॉप किया।
डीडीयू में संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. मुरली मनोहर पाठक कहते हैं कि किसी भी भाषा को धर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। बीएचयू की घटना की जितनी निंदा की जाए वो कम है। वे बताते हैं कि प्रो. असहाब अली गोरखपुर विश्वविद्यालय में 32 वर्षों तक अध्यापन कराते रहे। वे संस्कृत के मर्मज्ञ हैं। संपूर्ण शिक्षक और बेहद लोकप्रिय रहे हैं। किसी विभाग का अध्यक्ष बनने वाले वह पहले मुसलमान हैं। डा. फिरोज खान को लेकर जो विवाद बीएचयू में चल रहा है वो सही नहीं हैं। इसके पीछे राजनीति भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि वे सबसे योग्य रहे हैं, यही वजह है कि जटिल चयन प्रकिया से चयनित होकर आए हैं। संस्कृत के किसी ग्रंथ में नहीं लिखा है कि उसे धर्म से जोड़ा जाय। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा मनुष्यता की भाषा है। धर्म विशेष या जाति विशेष से उसे नहीं जोड़ा जाता है। ये संविधान के तहत उनकी नियुक्ति हुई है। उसे स्वीकार करना चाहिए।
