संभल स्थित कब्रिस्तान की जमीन की पैमाइश का के मामले में 17 याचियों को हाईकोर्ट से झटका लगा है. अदालत ने फैसले में अनुच्छेद 226 का हवाला दिया है. इस मामले में याचिकाकर्ताओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली. हाईकोर्ट ने कब्रिस्तान के मामले में हस्तक्षेप से इंकार कर दिया.
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को रेवेन्यू टीम के सामने पेश होकर अपनी बात रखने के लिए कहा है. 17 याचिकाकर्ताओं ने कब्रिस्तान के पास हुई पैमाइश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. कोर्ट बंद होने के बावजूद स्पेशल वेकेशन बेंच ने मामले में सुनवाई की.
कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दिया फैसला
डबल बेंच ने संभल में जामा मस्जिद के पास स्थित आठ बीघा कब्रिस्तान की जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में याचिका को निस्तारित करते हुए फैसला दिया है. 17 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर बुधवार (31 दिसंबर) को दाखिल याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में अर्जेंट बेसिस पर सुनवाई की थी.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जो भी हो भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए यह कोर्ट तथ्यों के ऐसे विवादित सवालों में नहीं जा सकता. बता दें कि मंगलवार (30 दिसंबर) को रेवेन्यू टीम ने पैमाइश की है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की डिविजन बेंच ने की है.
क्या कहता है अनुच्छेद 226?
अनुच्छेद 226 भारतीय संविधान का एक जरूरी अनुच्छेद है. यह हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश जारी करने की शक्ति देता है. इस अनुच्छेद के तहत हाईकोर्ट राज्य सरकार, प्राधिकरण और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आदेश जारी कर सकता है.
वहीं हाईकोर्ट अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ Habeas Corpus, सरकारी अधिकारी को अपने कर्तव्य निभाने के लिए आदेश , गलत आदेशों को रद्द, किसी भी पद पर बैठे गलत व्यक्ति से सवाल करने के खिलाफ रिट जारी कर सकता है. अदालत ने इन याचिकाओं को अनुच्छेद 226 का हवाला देते हुए खारिज कर दिया.