लोकसभा में तीन बिलों पर सपा किस ओर करेगी वोट? प्रिया सरोज के बयान से साफ हो गई तस्वीर!
लोकसभा में तीन विधेयकों को लेकर असमंजस की स्थिति है कि सरकार के साथ कौन है और कौन नहीं. इस बीच प्रिया सरोज के बयान की चर्चा है.

उत्तर प्रदेश स्थित जौनपुर के मछलीशहर से समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज ने सदन में महिला आरक्षण से जुड़े तीन विधेयकों पर चर्चा के दौरान सरकार की मंशा और प्रक्रिया दोनों पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उसके पीछे की नीतियां साफ और ईमानदार हों.
प्रिया सरोज ने अपने संबोधन में कहा, 'लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल कानून बनाना नहीं होता बल्कि सुरक्षित करना होता है कि कानून के पीछे की नीतियां भी उतनी साफ और ईमानदार हो. जल्दबाजी में लिए फैसला इतिहास में गलत बन जाते हैं. सोच समझ कर लिया फैसला देश की तकदीर बन जाती है.' उन्होंने खुद को “आधी आबादी की आवाज” बताते हुए आरोप लगाया कि महिलाओं को अक्सर प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन अधिकार देने के वक्त उन्हें “शतरंज की गोटियों” की तरह उपयोग किया जाता है.
उन्होंने स्पष्ट किया, 'हम सब महिला आरक्षण बिल के सपोर्ट में थे, है रहेंगे. कोई इफ एंड बट की बात नहीं है.' लेकिन साथ ही सवाल उठाया कि क्या यह बिल वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए है या इसके जरिए राजनीतिक उद्देश्यों को साधा जा रहा है.
महिला आरक्षण के नाम पर असल एजेंडा बदल- प्रिया
सरोज ने आरोप लगाया कि सरकार ने महिला आरक्षण के नाम पर असल एजेंडा बदल दिया है. उन्होंने कहा, 'अध्यक्ष महोदय हक की बात कही मगर शर्तों में उलझा दिया. महिलाओं के नाम पर सारा एजेंडा ही बदल दिया. नीतियां अगर साफ होती हक कबका मिल जाता आपने भविष्य कहकर उनका आज ही टाल दिया.'
तीनों विधेयकों की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि राज्य चुनाव से ठीक पहले विशेष सत्र बुलाना “कोइंसिडेंस नहीं, कैलकुलेशन” है. उनके मुताबिक, इन विधेयकों के जरिए देश के राजनीतिक नक्शे और प्रतिनिधित्व की संरचना को बदलने की कोशिश की जा रही है.
प्रिया सरोज ने विधेयकों की कई तकनीकी खामियों की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा कि आर्टिकल 82 में संशोधन कर डीलिमिटेशन को सरकार की मर्जी पर छोड़ दिया गया है, जबकि पहले यह हर जनगणना के बाद अनिवार्य प्रक्रिया थी. उन्होंने कहा, 'पुराने आंकड़ों से नया इतिहास नहीं लिखा जाता. सच्चाई छुपाकर लोकतंत्र चला नहीं जाता.'
उन्होंने लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है. साथ ही, महिला आरक्षण को डीलिमिटेशन से जोड़ने पर उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि इससे महिलाओं को तत्काल अधिकार नहीं मिलेगा.
सरोज ने कहा कि पूरी प्रक्रिया का नियंत्रण सरकार के हाथ में है, जिससे “मनमर्जी” की आशंका बढ़ती है. उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के संघीय ढांचे के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रस्ताव केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन को कमजोर कर सकता है और उत्तर-दक्षिण के बीच राजनीतिक तनाव भी बढ़ा सकता है.
'एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सरसाइज का इंतजार कराया जाएगा?'
सोशल जस्टिस के मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा कि देश की करीब 40% आबादी ओबीसी है, लेकिन इस बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए कोई स्पष्ट सब-कोटा नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर सभी वर्गों की महिलाओं को समान प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो इसका लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट जाएगा.
सबसे अहम सवाल उठाते हुए प्रिया सरोज ने कहा, 'अगर आज 543 सीट मौजूद है तो उन पर 33% रिजर्वेशन लागू क्यों नहीं किया जा रहा है? क्या महिलाओं का अधिकार किसी एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सरसाइज का इंतजार कराया जाएगा?'
उन्होंने दो टूक कहा, 'हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है. हम उसके नाम पर उसके नाम पे हो रहे अप्रोच के खिलाफ हैं.' उन्होंने सरकार से मांग की कि यदि नीयत साफ है, तो आने वाले चुनाव में ही 33% आरक्षण लागू किया जाए और डीलिमिटेशन बाद में कराया जाए.
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि महिलाओं को उनका अधिकार किसी वादे या भविष्य की योजना के रूप में नहीं, बल्कि आज की हकीकत के रूप में मिलना चाहिए. उन्होंने सरकार से महिला आरक्षण को बिना किसी “राजनीतिक खेल” के जल्द लागू करने की मांग करते हुए कहा, 'हक की बात है तो उसे आज निभाइए. वादों के पीछे सच और मत छुपाइए. नारी शक्ति के नाम पर खेल खेलना बंद कीजिए. जो वादा किया हक का उसे तुरंत लागू कर दीजिए.'
किस खेमे के पास कितना वोट?
लोकसभा में संख्या बल को लेकर विपक्षी खेमे का दावा है कि उनके पास मौजूद और मतदान करने वाले सांसदों की संख्या मजबूत स्थिति में है. कांग्रेस के 95, समाजवादी पार्टी के 37, डीएमके के 22 और टीएमसी के 20 सांसदों के साथ यह आंकड़ा 174 तक पहुंचता है. विपक्ष का कहना है कि यदि एनडीए 320 के आंकड़े पर है, तो ऐसे में 174 सांसद भी संविधान संशोधन विधेयक को चुनौती देने के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं, खासकर अगर सत्ता पक्ष में पूरी एकजुटता नहीं रहती है.
इसके अलावा सीपीएम, सीपीआई, सीपीआई (एमएल), आरएसपी, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, वीसीके, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी), केरल कांग्रेस, बीएपी और एमडीएमके जैसे दलों के सांसदों को जोड़ने पर विपक्ष का आंकड़ा और बढ़ता है. विपक्षी सूत्रों का दावा है कि कुल मिलाकर 200 से अधिक सांसद सदन में मौजूद रहेंगे और मतदान करेंगे, जिससे इस विधेयक पर कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.
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