राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सोशल मीडिया पर चल रहे आरक्षण हटाओ आंदोलन के बीच बड़ा बयान दिया है. भागवत ने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 'आरक्षण उत्थान के लिए है. स्थायी नहीं. जिन लोगों को इसका लाभ मिल चुका है, वह इसे छोड़ दें.' भागवत ने यह भी कहा कि कोटे का राजनीतिकरण जानबूझकर किया गया.
सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि, मोहन भागवत आज छात्रों से संवाद की बात तब कर रहे हैं, जब बीजेपी इन मुद्दों पर घिरी हुई है. ये कभी बीजेपी से सवाल नहीं करते, न ही सरकार से कोई जवाब मांगते हैं. 69,000 शिक्षक भर्ती पर इन्होंने कुछ नहीं बोला. एक ही जाति के 15 प्रोफेसरों की नियुक्ति कर दी गई, तब भी ये चुप रहे. ये सिर्फ तब बोलते हैं, जब पिछड़ों और दलितों के आरक्षण पर सवाल उठाना होता है. अगड़ों के आरक्षण पर यानी NFS (नॉट फाउंड सुटेबल) पर कभी कुछ नहीं कहते. इन्होंने नया तरीका खोज लिया है.
NFS पर बात क्यों नहीं करती RSS?- सपा
सपा नेता ने कहा कि दलितों और पिछड़ों के मुद्दे पर ही सलाह देते हैं. कभी ये क्यों नहीं कहते हैं कि संपन्न लोग ईडब्ल्यूएस (EWS) छोड़ दें ताकि इसके तहत गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ मिले. पिछड़ों और दलितों के आरक्षण पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं? बीजेपी से जुड़े सभी संगठन राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि भाजपावादी हैं.
अब उनके इस बयान पर सियासी प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है. हरियाणा से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राज्यसभा सांसद करमवीर सिंह बौध ने कहा, 'मैं मोहन भागवत से आग्रह करता हूं कि सभी को समान रूप से काम करना चाहिए. वे सड़कें साफ करें, वे नालियां साफ करें, सभी को वह काम भी करना चाहिए. आज मोहन भागवत को यह देखना चाहिए कि आजादी के बाद, इस देश के संविधान निर्माताओं ने जिस तरह से न्याय की बात सोची थी, आरक्षण कोई खैरात नहीं है. आरक्षण हमारा संवैधानिक अधिकार है. आरक्षण को एक नाम दिया गया है. यह आरक्षण नहीं है.'
भागवत के बयान पर राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि आरक्षण के मुद्दे पर BJP और RSS की विचारधारा हमेशा से स्पष्ट और खुली रही है. इसमें कुछ भी छिपा हुआ नहीं है. वे नहीं चाहते कि आरक्षण जारी रहे.
