उत्तराखंड की भागीरथी घाटी में पहाड़ों की उन हलचलों को सैटेलाइट ने कैद किया है, जो सामान्य तौर पर इंसानी आंखें नहीं देख सकती हैं. देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक आनंद कुमार गुप्ता, खायिंगशिंग लुईरेई और मोहम्मद शावेज के साथ सिक्किम यूनिवर्सिटी के विक्रम गुप्ता ने रैथल, भटवाड़ी और बारसू की ढलानों का अध्ययन किया.

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इन वैज्ञानिकों ने जनवरी 2021 से मार्च 2025 तक Sentinel-1 सैटेलाइट से ली गई  243 रडार तस्वीरों का PS-InSAR तकनीक से विश्लेषण किया. अध्ययन का मकसद इन ढलानों की धीमी गति को समझना और भविष्य में पैदा होने वाले भूस्खलन के खतरे का आकलन करना था. 

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बारसू में सबसे ज्यादा खिसकाव दर्ज

शोधकर्ताओं के मुताबिक रैथल की ढलान करीब 5 मिलीमीटर प्रति वर्ष पूर्व दिशा में खिसक रही है और करीब 3 मिलीमीटर प्रति वर्ष नीचे जा रही है. भटवाड़ी की ढलान प्रति वर्ष लगभग 4 मिलीमीटर पूर्व दिशा की ओर धीरे-धीरे खिसक रही है, जबकि जमीन करीब 2 मिलीमीटर प्रति वर्ष ऊपर उठ रही है. वैज्ञानिकों ने भटवाड़ी के इस पैटर्न को रोटेशनल लैंडस्लाइड एक्टिविटी का संकेत माना है.

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि बारसू की जमीन करीब 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष पूर्व की खिसक रही है और लगभग 3 मिलीमीटर प्रति वर्ष नीचे की तरफ धंस रही है. वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों को सिर्फ सैटेलाइट तक सीमित नहीं रखा. मौके की जांच में दरारें,सीढ़ीनुमा ढलान या कटाव, झुकी हुई संरचनाएं, क्षतिग्रस्त सड़कें और जमीन पर पानी जमा होने के निशान रिकॉर्ड किए हैं. 

धीरे खिसकना ही सबसे बड़ी चिंता

वैज्ञानिक आनंद कुमार गुप्ता और उनके सहयोगियों के मुताबिक ये ढलानें अभी धीमी गति से खिसक रही हैं, लेकिन ऐसे बहुत गहराई तक फैले और धीरे-धीरे हो रहे खिसकाव को नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है. लंबे समय तक चलने वाली यह हलचल किसी बड़े प्राकृतिक ट्रिगर के बाद अचानक बड़ा रूप ले सकती है.

रिसर्च में खास तौर पर भारी बारिश और भूकंप को इसके लिए खतरनाक माना जा रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी स्थिति में ढलान का बड़ा हिस्सा अचानक टूट सकता है और उसका मलबा भागीरथी नदी के प्रवाह को रोक सकता है. 

भागीरथी रुकी तो नीचे तक बढ़ सकता है खतरा

रिसर्च का सबसे अहम हिस्सा नदी से जुड़ा है. वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि अगर बड़े भूस्खलन का मलबा भागीरथी को रोक देता है तो नदी के पीछे पानी जमा हो सकता है. बाद में यह अवरोध टूटने या पानी अचानक निकलने की स्थिति में नीचे की ओर बड़ा खतरा पैदा कर सकता है. यानी खतरा सिर्फ उस ढलान या गांव तक सीमित नहीं रहेगा, जहां भूस्खलन होगा. नदी का प्रवाह प्रभावित होने की स्थिति में उसका असर निचले इलाकों तक पहुंच सकता है.

सैटेलाइट के आंकड़ों की जमीन पर भी हुई पुष्टि:

वाडिया के वैज्ञानिकों आनंद कुमार गुप्ता, खायिंगशिंग लुईरेई, विक्रम गुप्ता और मोहम्मद शावेज ने सैटेलाइट से मिले विरूपण डेटा (Deformation Data) को फील्ड जांच से भी मिलाया. जांच के दौरान प्रभावित ढलानों पर दरारें, जमीन के उभरे हुए हिस्से, झुकी हुई संरचनाएं, क्षतिग्रस्त सड़कें और जगह-जगह बने लंबे तथा आड़े-तिरछे जलभराव वाले तालाब मिले. वैज्ञानिकों के मुताबिक ये जमीनी संकेत सैटेलाइट से दर्ज हुई लगातार हो रही ढलान की हलचल को पुष्टी करते हैं. 

वैज्ञानिकों ने सरकार के लिए भी बताया रास्ता

खायिंगशिंग लुईरेई और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने इस खतरे का आकलन करने के लिए सिर्फ सैटेलाइट की तस्वीरों पर निर्भर रहने के बजाय आगे व्यापक जांच की जरूरत बताई है. उनका सुझाव है कि PS-InSAR से मिले विरूपण डेटा को स्लोप स्टेबिलिटी एनालिसिस के साथ जोड़ा जाए. इसमें क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना, बारिश और भूकंप के प्रभाव को एक साथ शामिल करना होगा. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी ढलान के टूटने की स्थिति में जोखिम कितना बड़ा हो सकता है और उसके आधार पर उस जोखिम को कम करने की योजना तैयार की जा सकेगी. 

रिसर्च के बाद क्या बढ़ेगा जांच दायरा?

रिसर्च ने भागीरथी घाटी की तीन संवेदनशील ढलानों में मूवमेंट के वैज्ञानिक प्रमाण सामने रखे हैं. ऐसे में अब सवाल यह है कि इन इलाकों की निगरानी किस स्तर पर की जा रही है और क्या सैटेलाइट से मिले नए आंकड़ों को सरकारी आपदा प्रबंधन और स्लोप स्टेबिलिटी प्लानिंग में शामिल किया जाएगा?

खासकर रैथल, भटवाड़ी और बारसू में सैटेलाइट मॉनिटरिंग के साथ जमीनी स्तर की जांच को लगातार जारी रखना महत्वपूर्ण होगा. अगर किसी ढलान की गति अचानक बढ़ती है तो उसके संकेत समय रहते मिल सकें, यही इस तरह की निगरानी का सबसे बड़ा फायदा होगा.

रिसर्च का संदेश क्या है?

यह अध्ययन यह नहीं कहता कि भागीरथी नदी अभी रुकने वाली है या इन तीनों जगहों पर तत्काल भूस्खलन होने वाला है. वैज्ञानिकों ने संभावित जोखिम की पहचान की है और चेताया है कि लगातार खिसक रही ढलानें भारी बारिश या भूकंप के बाद अचानक खतरे में बदल सकती हैं.

यही इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भूस्खलन होने के बाद खतरे का इंतजार करने के बजाय पहाड़ की पहले से चल रही हलचल को पहचानना और उसी आधार पर तैयारी करना. भागीरथी घाटी में सैटेलाइट ने जो संकेत दिए हैं, अब उन्हें जमीन पर निगरानी और आपदा जोखिम कम करने की रणनीति में बदलना अगली बड़ी चुनौती है. 

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