उत्तराखंड सरकार ने जंगल की आग रोकने और बुझाने में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों और टीमों को एक लाख रुपये तक के नकद इनाम देने की योजना तैयार की है. यह प्रस्ताव उत्तराखंड वन विभाग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामने आया, जहां मुख्य वन संरक्षक (वनाग्नि) सुशांत पटनायक ने राज्य की "फॉरेस्ट फायर कंट्रोल एंड मैनेजमेंट 2026" रणनीति पेश की. इस मौके पर वन मंत्री सुबोध उनियाल और वन विभाग प्रमुख रंजन मिश्रा भी मौजूद रहे.
इस नई रणनीति के तहत फायर सीजन खत्म होने के बाद हर जिले में तीन श्रेणी के पुरस्कार दिए जाएंगे, पहला पुरस्कार एक लाख रुपये, दूसरा 75 हजार रुपये और तीसरा 51 हजार रुपये. सीधे शब्दों में कहें तो सरकार चाहती है कि आम लोग, वनकर्मी, स्वयं सहायता समूह सब मिलकर जंगलों को बचाने में आगे आएं, और उनकी इस हिम्मत को सरकार पैसों से पुरस्कृत करे.
दस साल का भयावह आंकड़ा 14,638 बार जले जंगल
वन विभाग ने जो आंकड़े पेश किए, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं. पिछले एक दशक में उत्तराखंड में 14,638 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें करीब 23,682.77 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित हुई. इस दौरान 35 लोगों की जान गई और 76 अन्य घायल हुए. साल 2026 की तस्वीर भी कम डरावनी नहीं है. इस साल अब तक 394 वनाग्नि की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनसे लगभग 331.12 हेक्टेयर जंगल राख हुए हैं. एक व्यक्ति की मौत भी इस सीजन में दर्ज हो चुकी है.
वजह क्या है - मौसम और जलवायु की मार
सुशांत पटनायक ने बताया कि बढ़ते वैश्विक तापमान, लंबे समय तक चलने वाले सूखे दौर, अनियमित मानसून पैटर्न और अल नीनो जैसी जलवायु परिघटनाओं के कारण उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. मौसम विभाग (IMD) के देहरादून केंद्र ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ेगा, जिससे आग का खतरा और गंभीर होगा.
चमोली में जंगल की आग ने ली सुरेशी देवी की जान
इस भीषण आग का सबसे दिल दहलाने वाला पहलू चमोली जिले से सामने आया. आदिबदरी तहसील के बूंगा गांव में बदाढ़गाड जंगल में मंगलवार दोपहर से लगी आग देर शाम तक विकराल रूप लेती गई, और तेज हवाओं के चलते इसकी चपेट में आकर एक महिला की दर्दनाक मौत हो गई.
मृतका 50 वर्षीय सुरेशी देवी थीं, जो अपने पति मदन लाल के साथ बूंगा गांव में रहती थीं. शाम करीब सात बजे वह घर से महज 200 मीटर दूर अपनी गौशाला की तरफ जा रही थीं, तभी जंगल की आग रास्ते तक पहुंच गई. तेज हवा ने आग को पलभर में भयानक बना दिया और सुरेशी देवी लपटों में घिर गईं. उनकी चीखें सुनकर ग्रामीण दौड़े, किसी तरह उन्हें निकाला, लेकिन अस्पताल ले जाने की तैयारी हो पाती, उससे पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया.
चमोली के ही नारायणबगड़ क्षेत्र के पालछूनी गांव के पास भी जंगलों में आग की घटनाएं सामने आईं. रेस चोपता गांव में एक अन्य महिला कश्मीरा देवी भी जंगल की आग में बुरी तरह झुलस गईं, जिनका इलाज कर्णप्रयाग उपजिला अस्पताल में चल रहा है. सिर्फ चमोली नहीं, विकासनगर के त्यूणी क्षेत्र की देवघार रेंज में आग ने जंगलों के साथ सेब के बागीचों और ग्रामीणों की छनिया (मवेशियों के रहने की जगह) को भी राख कर दिया, जिससे गांव में डर और चिंता का माहौल है.
नई टिहरी में भी जंगलों की आग थमने का नाम नहीं ले रही, जिला मुख्यालय के पास छमुंड और पोखाल रेंज के कई इलाकों में जंगल लगातार जल रहे हैं. गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में आग 6 हजार फीट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी है.
उत्तराखंड सरकार की तैयारियां- जमीन से लेकर तकनीक तक
उत्तराखंड सरकार सिर्फ इनाम की घोषणा पर नहीं रुकी है, बल्कि इस बार की तैयारी कई मोर्चों पर है. 2026 के फायर सीजन में 5,625 फायर वॉचर्स तैनात किए गए हैं. इन सभी का 10 लाख रुपये तक का सामूहिक दुर्घटना बीमा कराया गया है. वर्ल्ड बैंक वित्तपोषित U-PREPARE प्रोजेक्ट के तहत टीमों को विशेष फायर रेक, सुरक्षा सूट, हेलमेट और हेडलैंप दिए गए हैं.राज्य मुख्यालय में एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनाया गया है, जो 1,438 क्रू स्टेशनों, 40 मास्टर कंट्रोल रूम और 174 फायर वॉचर टावरों से जुड़ा है.
वन विभाग ने 2026 में 3,235 जनजागरूकता कार्यक्रम चलाए, जिनमें 81,414 लोगों ने हिस्सा लिया. IMD के साथ MoU किया गया है, जिससे कस्टमाइज्ड वनाग्नि पूर्वानुमान मिल सकें. वन विभाग ने IVRS हेल्पलाइन नंबर 1926 शुरू किया है और "उत्तराखंड फॉरेस्ट फायर" मोबाइल ऐप लॉन्च किया है, जिससे आम लोग आग की सूचना तुरंत दे सकें. ग्राम पंचायत और क्लस्टर स्तर पर 496 फॉरेस्ट फायर प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट कमेटियां बनाई गई हैं, और आग रोकने में मदद करने वाली कमेटियों को 30,000 रुपये का प्रोत्साहन दिया जा रहा है.
पिरूल (चीड़ की सूखी पत्तियां) - आग की जड़, अब कमाई का जरिया
जंगल की आग में सबसे बड़ा "ईंधन" चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पिरूल होती हैं. इसी समस्या को अवसर में बदलने के लिए वन विभाग "पाइन पिरूल कलेक्शन स्कीम" चला रहा है, जिसके तहत स्थानीय लोगों को 10 रुपये प्रति किलो की दर से सूखी चीड़ की पत्तियां इकट्ठा करने पर भुगतान किया जाता है. राज्य में पिरूल आधारित पेलेट और ब्रिकेट बनाने की 9 इकाइयां चल रही हैं, पिछले चार वर्षों में 13,003.56 टन पिरूल इकट्ठा किया गया है और 2026 का लक्ष्य 8,555 टन रखा गया है.
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