आगरा, नितिन उपाध्याय। 14 फरवरी को हुए पुलवामा हमले में आगरा ने भी अपना एक लाल खोया था। कहरई गांव के रहने वाले कौशल कुमार आतंकियों के इस कायराना हमले में शहीद हुए थे। शहादत के बाद सरकार से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से बड़ी बड़ी बातें परिवार के लिए हुई, लेकिन वक्त के साथ ही शासन-प्रशासन शहीद के परिवार के प्रति लापरवाह और संवेदनहीन हो गया। ऐसे में हादसे के तकरीबन एक साल पूरा होने जा रहा है। एबीपी गंगा की टीम ने शहीद के घर पहुंचकर उनका हाल चाल जाना, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ।
आगरा का कहरई गांव भले ही आज शहीद कौशल कुमार रावत की वजह से जाना जाने लगा हो लेकिन सरकारी उदासीनता और संवेदनहीनता परिवार के ज़ख्म को और गहरा कर रहे हैं। एबीपी गंगा की टीम ने जब गांव पहुंचकर परिवारीजनों से बात की तो दर्द का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा। शहीद की मां सुधा रावत की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। अपने बेटे का देश के प्रति न्यौछावर होने का उनको गर्व था लेकिन सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार से मां पूरी तरह निराश दिखीं।
सुधा रावत आगे कहती हैं कि तत्कालीन ज़िलाधिकारी एन जी रवि कुमार ने उन्हें केवल आश्वासन देकर पल्ला झाडा। अभी भी बेटे का शहीद स्मारक सरकारी जमीन पर ना बनकर परिवार की जमीन पर निर्माणाधीन है जबकि सरकारी नियम है कि शहीद स्मारक के लिए सरकार जगह देती है। इसके साथ ही घोषणा के मुताबिक ना गांव के संपर्क मार्ग का नाम शहीद के नाम पर हुआ और ना ही गांव का प्रवेश द्वार।
शहीद कौशल कुमार रावत की पत्नी और उनके बच्चे हरियाणा के मानेसर में रहते हैं लेकिन अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए लगातार वो आगरा अपने गांव आती रहती हैं। कहरई में शहीद के भाई कमल किशोर रावत भी सरकारी सिस्टम से पूरी तरह निराश हैं। शहीद कौशल कुमार के भाई कमल किशोर रावत कहते हैं कि उस समय कई घोषणा हुई थी लेकिन ज्यादातर घोषणा बनकर ही रह गईं। अब स्मारक बनने की शुरुआत ही हुई है जबकि एक साल हो गए कब का बन जाना चाहिए था। कौशल कुमार के पिता गीताराम रावत भी जनवरी माह में अपने बेटे के गम में चल बसे।
शहीद कौशल कुमार के परिवार की शिकायत पर आर्थिक गबन के आरोप में हाल ही में ज़िला विकास अधिकारी देवेंद्र प्रताप सिंह को मुख्यमंत्री ने निलंबित करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले को लेकर ज़िलाधिकारी प्रभु नारायण सिंह का कहना है कि मैंने हाल ही में ज़िले का चार्ज संभाला है। जल्द ही शहीद के परिवार से मिलकर उनकी मांगों पर अमल किया जाएगा।
कुल मिलाकर जिस शहीद ने अपना लहू देश के लिए बहाया उसके परिवार के प्रति प्रशासन की असंवेदनशीलता सिस्टम पर कई सवाल खड़े करती है।