सावन के पवित्र महीने में कांवड़ मेले (Kanwar Mela) के दौरान आस्था, श्रद्धा और शिव भक्ति के कई अद्भुत रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन हरिद्वार में एक ऐसा नजारा सामने आया जिसने वहां मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम कर दीं. मातृ-पितृ देवो भव: की भावना को चरितार्थ करते हुए दो सगे भाई आधुनिक युग के 'श्रवण कुमार' बन गए हैं. बागपत (Baghpat) जिले के ग्राम चिरचिट के रहने वाले संजीव कुमार और अनिल कुमार अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा करा रहे हैं.

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हर की पैड़ी से जल भरकर शुरू की 200 KM की यात्रा

जानकारी के अनुसार, संजीव और अनिल पहली बार कांवड़ लेने हरिद्वार पहुंचे हैं. दोनों भाइयों ने हर की पैड़ी (Har Ki Pauri) से पवित्र गंगा जल भरा और फिर अपने पिता वेदराम और माता राजेंद्र को कांवड़ के दोनों पलड़ों में सम्मानपूर्वक बैठाकर अपने गृह जनपद बागपत के लिए रवाना हो गए. दोनों भाई बारी-बारी से इस भारी कांवड़ को अपने कंधों पर उठाकर 200 किलोमीटर की यह लंबी दूरी तय करेंगे.

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'माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म'

जब संजीव और अनिल से इस कठिन संकल्प के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब बेहद भावुक करने वाला था. दोनों भाइयों ने बताया कि भगवान से उनकी कोई विशेष मनोकामना नहीं है. वे माता-पिता की सेवा को ही अपना सबसे बड़ा धर्म और तीर्थ मानते हैं. उनका मानना है कि सच्ची सफलता और सच्चा आशीर्वाद माता-पिता की सेवा से ही प्राप्त होता है. उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है, तो माता-पिता का मान-सम्मान करना सबसे जरूरी है.

लोगों ने दी 'श्रवण कुमार' की उपाधि

माता-पिता के प्रति दोनों भाइयों के इस निस्वार्थ समर्पण और सेवा भाव को देखकर रास्ते में मौजूद श्रद्धालु और स्थानीय लोग भी भावुक हो गए. हर कोई रुककर इस अद्भुत कांवड़ के दर्शन कर रहा है और दोनों भाइयों की खूब प्रशंसा कर रहा है. लोगों ने संजीव और अनिल को कलयुग के 'श्रवण कुमार' (Shravan Kumar) की उपाधि दी है.

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