इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका पर स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा केवल कानूनी पत्नी ही अपने पति से कर सकती है. यदि किसी महिला की पहली शादी वैध है और उसने बिना विधिवत तलाक लिए किसी अन्य पुरुष के साथ लंबा समय बिताया है, तो वह उस व्यक्ति से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार नहीं होगी.

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कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक शादी जैसे रिश्ते में रहने से किसी महिला को पत्नी का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होता. जब तक पहले विवाह का विधिवत विच्छेद न हो और दूसरी शादी कानून के अनुसार न की जाए, तब तक धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा स्वीकार्य नहीं है. 

पूरे मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार याची का पहला विवाह 29 अप्रैल 1992 को हुआ था और उससे दो बच्चे हैं. विवाद के बाद दोनों अलग रहने लगे. इस दौरान वह उन्नाव में प्रैक्टिस कर रहे एक वकील के संपर्क में आई और 2009 में कथित रूप से उससे विवाह कर लिया. करीब 10 साल साथ रहने के बाद विवाद बढ़ा और 2018 में याची ने भरण-पोषण की मांग की, जिसे अदालतों ने खारिज कर दिया.

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कोर्ट ने परिवार अदालत का आदेश रखा बरकरार

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने कानपुर की अतिरिक्त परिवार न्यायालय-2 के 12 फरवरी 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया. परिवार अदालत ने पहले ही यह कहते हुए भरण-पोषण की अर्जी खारिज कर दी थी कि याची कानूनी पत्नी नहीं है.

नोटरी समझौते से तलाक मान्य नहीं- हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने याची के उस तर्क को भी अस्वीकार कर दिया. जिसमें कहा गया था कि आपसी सहमति और नोटरीकृत दस्तावेज के जरिए पहला विवाह समाप्त हो गया था. कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे उपायों से विवाह का कानूनी रूप से अंत नहीं माना जा सकता और पहली शादी के अस्तित्व के बारे में अज्ञानता स्वीकार्य नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सविताबेन सोमाभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य (2005) के निर्णय का उल्लेख किया. इसमें कहा गया है कि अवैध विवाह से जुड़ी महिला को पत्नी की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता, इसलिए वह भरण-पोषण की पात्र नहीं होती.