लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी (BBAU) के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर और एचओडी ने शनिवार (16 मई) को वाइस चांसलर के चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं. प्रोफेसर गोविंद पांडे ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा कि इसमें पारदर्शिता का पूरी तरह से अभाव है. प्रोफेसर पांडे के सहकर्मियों ने कहा कि उनके पोस्ट को एक 'व्हिसलब्लोअर' के रूप में देखा जाना चाहिए, जो पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाता है. उन्होंने कहा कि पारदर्शिता की इस कमी के कारण अक्सर अयोग्य व्यक्तियों को प्रतिष्ठित पदों पर नियुक्त कर दिया जाता है.

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प्रोफेसर गोविंद पांडे का ये भी कहना है कि इस पोस्ट को किसी एक यूनिवर्सिटी से ना लेकर के जोड़ा जाए. उन्होंने कहा, ''इस पोस्ट को बड़े परिपेक्ष में देखा जाए और अगर किसी टीचर की नियुक्ति होती है तो उससे जुड़े सारे पहलू सामने निकल कर आ जाते हैं. वहीं अगर किसी वीसी की नियुक्ति होती है तो किस आधार पर उसको सेलेक्ट किया गया यह भी सार्वजनिक किया जाए. अपने मन मुताबिक या मंशा अनुरूप न सेलेक्शन किया जाए.''

'सत्ता में बैठे लोग सिर्फ चापलूसों को ही प्राथमिकता देते हैं'

प्रोफेसर पांडे ने सवाल उठाया, ''क्या भारत में सिर्फ कुछ ही चुनिंदा प्रोफेसरों के पास ऐसे गुण होते हैं जो उन्हें बार-बार कुलपति पद तक पहुंचने में सक्षम बनाते हैं? या फिर बाकी प्रोफेसरों के एपीआई स्कोर इतने कम होते हैं कि वे तीन उम्मीदवारों की अंतिम सूची में भी जगह नहीं बना पाते?” उन्होंने हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोग सिर्फ चापलूसों को ही प्राथमिकता देते हैं, चाहे उनकी वास्तविक उपलब्धियां शून्य ही क्यों न हों.

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BBAU के प्रोफेसर पांडे ने क्या दिए सुझाव?

यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर की नियुक्ति को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए, BBAU के प्रोफेसर पांडे ने सुझाव भी दिए. उन्होंने कहा, ''उम्मीदवारों को लाइव व्याख्यान देने चाहिए. छात्रों और शिक्षकों को मतदान करके यह तय करना चाहिए कि इस पद पर किसे नियुक्त किया जाना चाहिए.'' 

'चयन प्रक्रिया खुले चुनाव की तरह संचालित हो'

उन्होंने आगे कहा, ''कुलपति पद के आवेदकों को अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि चयनित होने पर वे यूनिवर्सिटी के लिए क्या हासिल करना चाहते हैं. इसके अलावा, उनकी चयन प्रक्रिया एक खुले चुनाव की तरह संचालित होनी चाहिए.'' इसके साथ ही प्रोफेसर ने चेतावनी भी दी कि कुछ चुनिंदा लोगों को शिक्षा पर मालिकाना हक देना इसे निश्चित रूप से बर्बाद कर देगा.