कोटद्वार में 26 जनवरी को हुए बवाल के तीन महीने बाद भी उस घटना के जख्म पूरी तरह नहीं भर पाए हैं. उस दिन की घटनाओं ने न केवल दो लोगों मोहम्मद दीपक और ‘बाबा’ अहमद की जिंदगी बदल दी, बल्कि पूरे इलाके में एक डर और अविश्वास का माहौल भी पैदा कर दिया. आज भी दोनों सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालात उनके लिए आसान नहीं हैं.

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वकील अहमद, जिन्हें लोग ‘बाबा’ के नाम से जानते हैं, पहले से ही पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. लेकिन इस घटना के बाद उनकी स्थिति और ज्यादा खराब हो गई है. उनके हाथ-पैरों में कंपन बढ़ गया है, जिससे उनका रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हो रहा है. इसके बावजूद वे हिम्मत नहीं हार रहे. वे रोज अपनी कोटद्वार स्थित दुकान खोलते हैं. उनका कहना है कि दुकान पर बैठना उन्हें लोगों के बीच रहने का मौका देता है, जिससे उन्हें मानसिक ताकत मिलती है और अकेलापन कम होता है.

आक्रामक बनने से बेहतर है सहना- वकील अहमद

घटना को याद करते हुए वकील अहमद कहते हैं कि उन्होंने कभी किसी से दुश्मनी नहीं रखी. उस दिन जब भीड़ ने उन्हें घेर लिया और नारेबाजी शुरू की, तब भी उन्होंने शांत रहना ही बेहतर समझा. उनके शब्दों में, “हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है, लेकिन आक्रामक बनने से बेहतर है सहना.” यह कहते-कहते उन्हें तेज कंपन का दौरा पड़ जाता है, जो उनकी हालत की गंभीरता को साफ दर्शाता है.

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दीपक ने बिना सोचे-समझे अहमद का किया बचाव

इस पूरी घटना में दीपक, जिन्हें लोग ‘मोहम्मद’ दीपक के नाम से जानने लगे हैं, एक अहम किरदार बनकर सामने आए. वकील अहमद बताते हैं कि घटना से पहले उनकी और दीपक की कभी बातचीत तक नहीं हुई थी. लेकिन जब हालात बिगड़े, तो दीपक ने बिना सोचे-समझे आगे बढ़कर उनका बचाव किया. उन्होंने न केवल उग्र भीड़ का सामना किया, बल्कि स्थिति को संभालने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दीपक पर भी पड़ा घटना का असर

हालांकि, इस घटना का असर दीपक पर भी कम नहीं पड़ा है. उन्हें अब भी राजनीतिक बयानों का सामना करना पड़ रहा है. इसके साथ ही उनके ऊपर दर्ज कई मुकदमों से भी वे जूझ रहे हैं. इन सबके बीच सामान्य जीवन जीना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.

जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश लेकिन हालात विपरीत

तीन महीने बीत जाने के बावजूद यह घटना लोगों के जहन में अभी भी ताजा है. समाज में अविश्वास और डर की भावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. दीपक और अहमद दोनों ही अपने-अपने तरीके से जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालात अभी भी उनके पक्ष में नहीं हैं.

यह घटना सिर्फ दो व्यक्तियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज के उस पहलू को भी उजागर करती है, जहां एक ओर भीड़ का उग्र रूप देखने को मिलता है, वहीं दूसरी ओर इंसानियत भी सामने आती है. कठिन समय में दीपक का साहस और वकील अहमद का धैर्य यह दिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता जिंदा रहती है.