यूपी की कानपुर सीट से समाजवादी पार्टी का कोई भी प्रत्याशी कभी भी संसद की दहलीज तक नहीं पहुंच सका। कानपुर सपा के लिए एक ऐसा लोकसभा क्षेत्र है जहां साइकिल ने कभी रफ्तार पकड़ी। चुनाव दर चुनाव सपा प्रत्याशी तो बदले, लेकिन नहीं बदली तो किस्मत। हालांकि, इस बार की लड़ाई कुछ अलग है क्योंकि इस बार के चुनाव में साइकिल और हाथी दोनों साथ-साथ हैं। दोनों दल एक-दूसरे के सहारे इस सीट पर लगे ग्रहण को दूर करने की जुगत में है।

अपनी रणनीति के तहत सपा ने इस सीट पर अपने पत्ते विरोधियों के बाद ही खोले। ब्राह्मण बहुल वाला ये जिला कांग्रेस और भाजपा का गढ़ रहा है। 1991 से लेकर 98 तक ये सीट भाजपा के पास रही तो 1999 से 2009 तक कांग्रेस के दिग्गज श्रीप्रकाश जायसवाल यहां से लगातार तीन बार सांसद रहे। हालांकि, 2014 में मोदी लहर ने जायसवाल से ये सीट छीन ली और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी यहां से सांसद बने। बतादें कि इस बार कांग्रेस ने फिर श्रीप्रकाश जायसवाल पर दांव खेला है। वहीं भाजपा ने मुरली मनोहर जोशी का टिकट काटकर योगी सरकार में मंत्री सत्यदेव पचौरी को मैदान में उतारा है। सपा-बसपा गठबंधन ने इस बार पूर्व सांसद मनोहर लाल के बेटे और उन्नाव से विधायक रहे रामकुमार को मैदान में उतारा है।

कानपुर में सपा के प्रदर्शन की बात करे तो 1998 में पार्टी ने सुरेंद्र मोहन अग्रवाल को टिकट दिया था। हालांकि वो दूसरे नंबर पर रहे। 1999 में श्याम लाल गुप्ता ने सपा की टिकट पर किस्मत आजमाई, लेकिन वो भी कुछ खास नहीं कर पाए। 2004 में सपा ने मुस्लिम प्रत्याशी हाजी मुश्ताक सोलंकी पर दांव खेला, लेकिन ये भी काम नहीं आया। सपा यहां तीसरे नंबर पर रही। इसके बाद 2009 और 2014 के चुनाव में सपा ने लगातार सुरेंद्र मोहन अग्रवाल पर भरोसा दिखाया। हालांकि अब भी कामयाबी नहीं मिली। समाजवादी पार्टी अपने इसी हार के सिलसिले को खत्म करने की कोशिश में लगी है।