भारतीय राजनीति में कई ऐसे मौके आए हैं जब कुछ फैसलों ने इतिहास की दिशा बदल दी. ऐसा ही एक दिलचस्प प्रसंग बहुजन आंदोलन के प्रमुख नेता कांशीराम और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा है. यह वह दौर था जब कांशीराम चाहते तो देश के राष्ट्रपति बन सकते थे, लेकिन उन्होंने खुद इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.

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साल 1996 से 1998 के बीच भारतीय राजनीति बेहद अस्थिर दौर से गुजर रही थी. उसी समय 11वीं लोकसभा के लिए कांशीराम पंजाब से सांसद चुने गए थे. दूसरी ओर, उस समय देश के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का कार्यकाल समाप्त होने वाला था और नए राष्ट्रपति के नाम को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो चुकी थी.

इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक विस्तार के लिए नई रणनीति पर काम कर रही थी. पार्टी पर लंबे समय से सवर्णों की पार्टी होने का आरोप लगता रहा था, इसलिए वह अनुसूचित जाति और दलित समुदाय के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही थी. इसी रणनीति के तहत भाजपा और बहुजन समाज पार्टी के बीच राजनीतिक संवाद भी बढ़ रहा था.

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वाजपेयी का प्रस्ताव

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि कांशीराम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाए. इसके लिए उन्होंने कांशीराम के सामने प्रस्ताव भी रखा था.

वाजपेयी ने उन्हें समझाया था कि अगर उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए आगे आता है तो शायद ही कोई राजनीतिक दल इसका विरोध करेगा. उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह भी कहा गया कि कई सहयोगी दलों को कांशीराम के नाम पर सहमति के लिए तैयार किया जा चुका था.

वाजपेयी का मानना था कि कांशीराम का नाम सामने आने से दलित समाज को एक बड़ा प्रतीकात्मक संदेश जाएगा और भारतीय राजनीति में एक नई शुरुआत हो सकती है.

कांशीराम ने ठुकराया प्रस्ताव

लेकिन कांशीराम ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. उनका मानना था कि राष्ट्रपति बनने से उन्हें रहने के लिए भव्य भवन और सम्मान तो मिल जाएगा, लेकिन जिस सामाजिक और राजनीतिक मिशन के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी समर्पित की है, वह अधूरा रह जाएगा.

कांशीराम का मानना था कि राष्ट्रपति का पद सम्मानजनक जरूर है, लेकिन उसमें सक्रिय राजनीतिक शक्ति सीमित होती है. वे अपने आंदोलन और बहुजन राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए मैदान में सक्रिय रहना चाहते थे. कहा जाता है कि उन्होंने वाजपेयी से यह भी कहा था कि उनका लक्ष्य राष्ट्रपति बनना नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र तक पहुंचना है.

एक दिलचस्प किस्सा यह भी बताया जाता है कि वाजपेयी एक समय कांशीराम को राष्ट्रपति और बाद में देश के राष्ट्रपति बने वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाना चाहते थे.

लेकिन दोनों ही नेताओं ने उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. कलाम मंत्री बनने के लिए तैयार नहीं थे, जबकि कांशीराम राष्ट्रपति बनने के लिए राजी नहीं हुए. इसके बावजूद वाजपेयी के साथ दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे बने रहे.

मिशन को दी प्राथमिकता

कांशीराम का पूरा राजनीतिक जीवन बहुजन आंदोलन को मजबूत करने के लिए समर्पित रहा. उन्होंने दलित, पिछड़े और वंचित समाज को संगठित करने के उद्देश्य से बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी.

उनका मानना था कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल प्रतीकात्मक पदों से नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत हासिल करके लड़ी जा सकती है. इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति पद जैसे प्रतिष्ठित प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया.

कांशीराम का यह निर्णय उनके राजनीतिक दर्शन को भी दर्शाता है. वे सत्ता में भागीदारी को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे और चाहते थे कि बहुजन समाज खुद राजनीतिक शक्ति हासिल करे.

2007 में दिखा मिशन का असर

9 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का निधन हो गया लेकिन दलितों को लेकर उनके मिशन का असर बाद के वर्षों में देखने को मिला. 2007 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ जब बहुजन समाज पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. यह पहली बार था जब बीएसपी ने अकेले दम पर उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की. इस जीत को कांशीराम के लंबे राजनीतिक संघर्ष और संगठन निर्माण की रणनीति का परिणाम माना गया.

हालांकि उसके बाद के वर्षों में पार्टी को कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन भारतीय राजनीति में बहुजन आंदोलन को मुख्यधारा में लाने का श्रेय काफी हद तक कांशीराम को ही दिया जाता है.

इतिहास का अधूरा मोड़

अगर कांशीराम उस समय राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते, तो शायद भारतीय राजनीति का एक अलग अध्याय लिखा जाता. लेकिन उन्होंने पद से ज्यादा अपने मिशन को महत्व दिया. इस फैसले ने यह भी दिखाया कि कांशीराम केवल सत्ता के पद के लिए राजनीति नहीं कर रहे थे, बल्कि वे सामाजिक बदलाव के बड़े लक्ष्य को लेकर काम कर रहे थे.