Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के मामले तेजी से घट रहे हैं. इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए अब लोग जागरुक हो रहे हैं. राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पिछले तीन सालों में राज्य के ग्रामीण और शहरी इलाकों में शादी (बाल विवाह) को लेकर करीब 1,120 परिवारों की सोच में बदलाव आया है.
महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक मनोज राय ने कहा, "यह 2019 के बाद से हमारी जिला टीमों द्वारा रोके गए बाल विवाहों की संख्या है. बाल विवाह स्कूल छोड़ने, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर और महिलाओं के सशक्तिकरण में बाधाओं सहित कई सामाजिक समस्याओं का आधार है."
प्रथा में कमी देखी जा रही हैअंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफएस) के पांचवें संस्करण (2019-20) के आंकड़ों से एक और संकेत मिलता है कि बाल विवाह प्रथा में कमी देखी जा रही है. सर्वेक्षण से यह पता चला कि यूपी में 20 से 24 साल की 16 फीसदी महिलाओं ने स्वीकार किया कि उनकी शादी 18 साल की कानूनी उम्र पूरी होने से पहले ही हो गई थी. हालांकि, एनएफएचएस 4 सर्वेक्षण (2015-16) के समय ऐसी महिलाओं का अनुपात 21% था. जबकि एनएफएचएस 3 सर्वेक्षण के समय यह डेटा 58% था. यानी अब मामले लगातार घट रहे हैं.
आंकड़ें लगातार हो रहे बेहतरआंकड़ों से यह भी पता चलता है कि यूपी में एनएफएचएस 4 सर्वेक्षण के बाद यह प्रतिशत अंक 5.3% था जो कि राष्ट्रीय औसत 3.5% से भी बेहतर था. इसमें महिला एवं बाल विकास विभाग के सामूहिक प्रयास इस बदलाव के अग्रदूत हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बाल विवाह को एक समस्या के रूप में स्वीकार करने में भूमिकाओं की पहचान और स्वामित्व एक महत्वपूर्ण कदम है.
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ये योजनाएं सहायक बन रहीं2018 से पहले, बाल विवाह के समय राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के माध्यम से एकत्र की गई शादी के बारे में एफआईआर ही इस मुद्दे पर जानकारी का एकमात्र स्रोत था. लेकिन अभी जिला टीमों के माध्यम से डेटा का व्यवस्थित संग्रह शुरू किया गया है. ग्राम बाल संरक्षण समितियों के माध्यम से एक प्रणाली बनाई गई थी और इन मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने और संचार बढ़ाने और किशोरियों को सशक्त बनाने के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिला शक्ति केंद्र और मिशन शक्ति अभियान जैसी कई योजनाएं और अभियान शुरू किए गए थे.
शादी का दबाव, शिक्षा से बाहर होने के कारणऐसा ही एक अभियान है मिशन शक्ति के तहत 'हक की बात, जिला अधिकारी के साथ'. इसके तहत किशोरियों को डीएम के साथ अपनी समस्याओं के बारे में बात करने का मौका मिलता है जो उनकी शिक्षा में बाधा उत्पन्न करती हैं या किसी भी तरह से असुविधा का कारण बनती हैं. शादी के लिए दबाव अक्सर शिक्षा से बाहर होने के कारण होता है. इसलिए, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा में बाधाओं की जाँच करने से विवाह में देरी करने में मदद मिल सकती है, ”विभाग में मुख्य परिवीक्षा अधिकारी आकांक्षा अग्रवाल ने कहा।
बाल विवाह रोकने में ये कार्यक्रम भी सहायकअन्य कार्यक्रम जिन्होंने बाल विवाह को रोकने के उद्देश्य में मदद की है, वे मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, नायक रक्षा उत्सव और महिलाओं के लिए कानूनी जागरूकता शिविर हैं. इन, जिला बाल संरक्षण इकाइयों, 181 हेल्पलाइन और वन-स्टॉप केंद्रों के साथ, बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में ग्राम बाल संरक्षण समितियों को काफी हद तक सहायता मिली.