Xप्लेन: चुनाव से पहले UP में महिलाओं को 50-50 हजार? ऐसा हुआ तो सरकार कैसे हो जाएगी कंगाल
CM Women Employment Scheme: बिहार की योजना उत्तर प्रदेश के लिए एक 'आइडिया' हो सकती है, लेकिन 'मॉडल' नहीं. उत्तर प्रदेश का आकार, आबादी और बजट इस योजना को लागू करने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएं हैं.

बिहार सरकार की 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' (MMRY) इन दिनों काफी चर्चा में है. इस योजना के तहत बिहार की 75 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये की पहली किस्त दी गई थी, जिस पर करीब 7,500 करोड़ रुपये खर्च हुए. अब सवाल उठता है कि अगर यही योजना उत्तर प्रदेश में लागू होती है, तो सरकार पर कितना बड़ा वित्तीय बोझ आएगा. इस सवाल ने और भी जोर तब पकड़ा जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने इस योजना पर कमान खींच दी...
सबसे पहले जानें कि बिहार में योजना से क्या-क्या हुआ?
बिहार की 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' 26 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए लॉन्च की थी. इसके तहत हर परिवार की एक महिला को 10,000 रुपये की शुरुआती आर्थिक मदद दी जाती है. इसके अलावा, छह महीने बाद काम के आधार पर 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता भी दी जाने का प्रावधान है.
योजना के तहत महिलाएं इस पैसे का इस्तेमाल कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, सिलाई-बुनाई या कोई और छोटा बिजनेस शुरू करने के लिए कर सकती हैं.
बिहार सरकार ने इस योजना के लिए 21,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया. पहले चरण में 75 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये यानी कुल 7,500 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए. बाद के चरणों में करीब 1.56 करोड़ महिलाओं को इस योजना का लाभ मिलने की उम्मीद है.
उत्तर प्रदेश में कितनी महिलाएं हैं?
चुनाव आयोग ने 10 अप्रैल 2026 को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची जारी की.

यह भी पढ़ते चलें कि अगर हम कुल जनसंख्या के आंकड़े देखें (जो मतदाता सूची से अलग है), तो उत्तर प्रदेश की कुल अनुमानित जनसंख्या 2026 में 24.35 करोड़ है. इसमें महिलाओं की संख्या करीब 11.68 करोड़ है. वहीं, 2026 की जनगणना के पहले फेज में 1.35 करोड़ परिवार रजिस्टर्ड हो चुके हैं. हालांकि, यह आंकड़ा जनगणना का शुरुआती चरण है. अब यह योजना आमतौर पर 18 साल या उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं को ही कवर करती है. इस वजह से हमारी गणना के लिए 6.09 करोड़ महिला मतदाताओं का आंकड़ा सबसे सटीक माना जाएगा.
उत्तर प्रदेश में लागू होने पर कितना खर्च आएगा?
अगर उत्तर प्रदेश में 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' लागू होती है और हर परिवार की एक महिला को 10 हजार रुपए देने का फॉर्मूला रखा जाता है, तो मतदाता सूची के आधार पर कुल महिलाओं को पहली किश्त में 10-10 हजार रुपए दिए, तो कुल 60,900 करोड़ रुपए खर्च होंगे. यह बिहार के 7,500 करोड़ के मुकाबले 8 गुना से भी ज्यादा है.
अगर सरकार योगी मॉडल के तहत 50,000 रुपये प्रति महिला देने का फैसला करती है, तो कुल खर्च 3.04 करोड़ रुपए से ज्यादा होगा. यह उत्तर प्रदेश के पूरे साल के बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा होगा. वित्त वर्ष 2025-26 में यूपी का बजट लगभग 7.36 लाख करोड़ रुपये था.
अगर सभी पात्र महिलाओं को 2 लाख रुपये तक की पूरी सहायता दी जाए, तो करीब 2,83,500 करोड़ रुपये तक खर्च आ सकता है.
अखिलेश यादव ने योजना पर क्या कहा?
इसी बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले पर बीजेपी को घेर लिया. अखिलेश यादव ने 13 अगस्त 2026 को X पर पोस्ट करते हुए कहा कि महिलाओं को 20,000 रुपये देने का वादा 'चुनावी फायदे' के लिए किया जा रहा है, न कि महिला सशक्तिकरण के लिए.
अखिलेश ने सवाल उठाया कि अगर सरकार महिलाओं की मदद करना चाहती थी तो पिछले दस साल में यह योजना क्यों नहीं लाई गई. अखिलेश ने दावा किया कि पिछले दस साल में अगर हर महिला को सालाना 50,000 रुपये दिए गए होते तो अब तक हर महिला को लगभग 5 लाख रुपये मिल चुके होते. अखिलेश ने कहा कि 20,000 रुपये की राशि इसका एक छोटा सा हिस्सा है.
अखिलेश ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं के लिए 'स्त्री सम्मान-समृद्धि योजना' लाएगी, जिसके तहत हर महिला को 40,000 रुपये सालाना दिए जाएंगे.
समाचार : भाजपा का एक और जुमला यूपी की महिलाओं को देंगे 20000
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) August 13, 2026
विचार : भाजपा के पास चुनाव जीतने के लिए पैसे के सिवा कुछ नहीं बचा है। वो भी भाजपा की पाप की कमाई है, जिसे उप्र की धार्मिक महिलाएँ कभी नहीं लेंगी। उप्र की जागरूक महिलाएं पूछ रही हैं जिन दूसरे राज्यों में महिलाओं को पैसे…
यूपी में योजना लागू करने पर असल चुनौतियां क्या हैं?
जब भी कोई बड़ी जनकल्याणकारी योजना की बात आती है, तो उसका गणित देखना बेहद जरूरी हो जाता है. यूपी में यह योजना लागू करने में 5 बड़ी चुनौतियां हैं:
चुनौती नंबर 1: उत्तर प्रदेश की कमाई के आगे कहां टिकेगा यह खर्च?
- उत्तर प्रदेश का बजट: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उत्तर प्रदेश का कुल बजट लगभग 9.72 लाख करोड़ रुपए है. इसमें से सिर्फ राजस्व घाटा ही करीब 64,458 करोड़ रुपए है, यानी सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए पहले से ही कर्ज लेना पड़ रहा है.
- योजना का संभावित खर्च: अगर उत्तर प्रदेश की 6.09 करोड़ महिला मतदाताओं को 10-10 हजार रुपये देने हैं, तो अकेले पहली किस्त पर 60,900 करोड़ रुपए खर्च होंगे. यह एक योजना ही राज्य के पूरे राजस्व घाटे (64,458 करोड़ रुपए) के बराबर खर्च है.
- एक्सपर्ट की नजर: यह वो पैसा है जो सरकार के पास नहीं है. इसे खर्च करने के लिए या तो दूसरी योजनाओं का बजट काटना होगा या फिर कर्ज लेना होगा. दोनों ही स्थितियाँ राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालेंगी.
चुनौती नंबर 2: बिहार से 8 गुना बड़ी जिम्मेदारी
बिहार में इस योजना को 'हर परिवार की एक महिला' के आधार पर लागू किया गया है. उत्तर प्रदेश में अगर यही फॉर्मूला लागू होता है, तो भी लाभार्थियों की संख्या बिहार से कहीं ज्यादा होगी:
| राज्य | अनुमानित लाभार्थी महिलाएं | पहली किस्त (10,000 रुपए) का खर्च |
| बिहार | 1.56 करोड़ | 15,600 करोड़ रुपए |
| उत्तर प्रदेश | 6.09 करोड़ | 60,900 करोड़ रुपए |
उत्तर प्रदेश में लाभार्थियों की संख्या बिहार से लगभग 4 गुना ज्यादा है. इसका मतलब है कि प्रशासनिक तंत्र पर भी 4 गुना ज्यादा बोझ पड़ेगा. पात्रता तय करना, आवेदनों की जांच करना, पैसे ट्रांसफर करना और निगरानी रखना इतनी बड़ी संख्या में संभव नहीं हैं.
चुनौती नंबर 3: राजनीतिक दबाव और चुनावी गणित
यहां पर सबसे दिलचस्प पहलू आता है- राजनीति...
- अखिलेश यादव का रुख: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महिलाओं को सालाना 40,000 रुपए देने की बात कही है. हालांकि, उन्होंने बिहार वाली इस योजना को उत्तर प्रदेश में लागू करने की कोई ठोस घोषणा नहीं की है. उनका यह बयान एक राजनीतिक दांव के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका मकसद महिला वोट बैंक को साधना है.
- विधानसभा चुनाव 2027: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल बड़ी घोषणा कर सकता है, लेकिन घोषणा करना और उसे लागू करना दोनों में बहुत फर्क है.
- एक्सपर्ट की नजर: राजनीतिक दल चुनावों से पहले बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन असली चुनौती तब आती है, जब सरकार बनने के बाद बजट की कमी और प्रशासनिक अक्षमता सामने आती है. अखिलेश यादव का बयान जितना महिला सशक्तिकरण की बात करता है, उतना ही चुनावी संकेत भी देता है.
चुनौती नंबर 4: पात्रता और टारगेट की पेचीदगी
वोट के लिए सिर्फ पैसे देने से काम नहीं चलता, यह तय करना भी जरूरी है कि किसे देना है और किसे नहीं.
उत्तर प्रदेश में हर परिवार की एक महिला को चुनना, उसका सत्यापन करना और डुप्लिकेट आवेदनों को रोकना एक बहुत बड़ा प्रशासनिक काम है. बिहार की इस योजना में भी यह सवाल उठा था कि क्या सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं को भी यह लाभ मिलना चाहिए. ऐसी पेचीदगियां उत्तर प्रदेश में और भी बड़ी होंगी.
चुनौती नंबर 5: क्या महिलाओं को सिर्फ पैसे की जरूरत है?
योजना का दूसरा चरण है- 2 लाख तक की अतिरिक्त सहायता. यह पैसा तभी मिलेगा जब महिला ने पहली किस्त का इस्तेमाल कोई काम शुरू करने के लिए किया हो. एक्सपर्ट्स का मानना है कि महिलाओं को सिर्फ पैसे देने से रोजगार नहीं बन जाता. महिलाओं को प्रशिक्षण, बाजार, कच्चे माल और मेंटरशिप की भी जरूरत होती है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ महिलाओं की साक्षरता दर और कौशल स्तर अलग-अलग है, यह और भी बड़ी चुनौती है.
'चेक-बुक' नहीं, 'रोडमैप' चाहिए
बिहार की यह योजना उत्तर प्रदेश के लिए एक 'आइडिया' हो सकती है, लेकिन 'मॉडल' नहीं. उत्तर प्रदेश का आकार, आबादी और बजट इस योजना को लागू करने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएं हैं. अगर कोई राजनीतिक दल इसे लागू करने की बात करता है, तो उसे पहले यह बताना होगा कि:
- इतना पैसा कहां से लाएगा?
- किन योजनाओं का बजट काटेगा?
- क्या वह राज्य को कर्ज के बोझ में डालने को तैयार है?
महिला सशक्तिकरण एक जरूरी लक्ष्य है, लेकिन उसके लिए सिर्फ 'चेक-बुक' नहीं, बल्कि एक 'रोडमैप' चाहिए. आंकड़े साफ हैं कि उत्तर प्रदेश में यह योजना फिलहाल कागजों पर ही सुंदर दिखती है, हकीकत में यह राज्य के बजट और प्रशासन पर भारी पड़ेगी.
























