हिमालय की गोद में बसे दो राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश. दोनों की भाषा अलग, संस्कृति अलग, लेकिन दर्द एक जैसा. हर मानसून में उफनती नदियां, दरकते पहाड़, फटते बादल और भूकंप के झटके इन दोनों राज्यों की साझी नियति यही रही है. लेकिन अब इस साझी पीड़ा को साझे समाधान में बदलने की कोशिश शुरू हुई है.

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सोमवार (20 अप्रैल) को हिमाचल प्रदेश के अपर मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत ने उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) का दौरा किया. यह दौरा महज औपचारिकता नहीं था, इसके पीछे एक गंभीर सोच थी कि अगर दोनों राज्य अपने-अपने अनुभव एक-दूसरे से साझा करें, तो शायद अगली आपदा में कुछ और जानें बचाई जा सकें.

दोनों राज्यों को मिलकर खोजने होंगे समाधान

उत्तराखंड के सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने हिमाचल के प्रतिनिधिमंडल के सामने उत्तराखंड में चल रहे आपदा न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी, जोखिम आकलन और जनजागरूकता के कामों को विस्तार से रखा.  पंत ने जो बात कही वह सुनने में सरल लगती है, लेकिन उसका मतलब बहुत गहरा है. 'दोनों राज्यों की जमीन एक जैसी है, आपदाएं एक जैसी हैं, तो समाधान भी मिलकर खोजने होंगे.'

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भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटना, बाढ़ और भूकंप यह पांच शब्द हर साल इन पहाड़ी राज्यों की नींद उड़ा देते हैं. ऐसे में अगर एक राज्य ने कोई कारगर तकनीक विकसित की है, तो दूसरा उससे क्यों न सीखे?

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उत्तराखंड के 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' की तारीफ

कमलेश कुमार पंत ने उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र की खुलकर सराहना की और साफ कहा कि हिमाचल में भी इसी तर्ज पर एक ऐसा केंद्र स्थापित करना है. उन्होंने उत्तराखंड से इस काम में तकनीकी सहयोग मांगा.

यह छोटी सी बात नहीं है. किसी दूसरे राज्य के काम की इस तरह तारीफ करना और उससे मदद मांगना, यह दिखाता है कि जब मामला जनता की जान का हो, तो राज्यों की सीमाएं आड़े नहीं आनी चाहिए. उत्तराखंड के भूदेव एप की भी बैठक में सराहना हुई. यह एप भूस्खलन संबंधी डेटा संकलन और निगरानी में मददगार साबित हुआ है.

कभी भी फट सकती हैं हिमनद झीलें 

बैठक में रुद्रप्रयाग जनपद में विकसित डिस्ट्रिक्ट डिजास्टर रिस्पॉन्स नेटवर्क (डीडीआरएन) पर भी चर्चा हुई. आपदा के वक्त जब सड़कें टूट जाती हैं, पुल बह जाते हैं और मोबाइल नेटवर्क काम करना बंद कर देता है, तब संचार का यह वैकल्पिक तंत्र जीवनरक्षक बन जाता है. इस प्रणाली को अन्य ज़िलों और राज्यों में भी लागू करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया गया.

हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है और उससे बन रही हिमनद झीलें कभी भी फट सकती हैं. 2013 की केदारनाथ त्रासदी इसी का भयावह उदाहरण है. हिमाचल ने इस दिशा में अपने स्तर पर काम शुरू किया है और उत्तराखंड के सचिव सुमन ने स्पष्ट कहा कि इस मोर्चे पर दोनों राज्यों को मिलकर काम करना होगा, जिससे निगरानी भी साझी हो, चेतावनी प्रणाली भी साझी हो.

हिमाचल का अनुभव, उत्तराखंड की जरूरत

एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि भूकंपरोधी भवन निर्माण के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के पास अच्छा अनुभव है, जिससे उत्तराखंड सीखना चाहता है. पहाड़ों में पक्के मकान बनाना और उन्हें भूकंप में टिकाए रखना. यह एक तकनीकी चुनौती है जिसका सस्ता और टिकाऊ हल खोजा जाना जरूरी है. दोनों राज्यों ने माना कि अगर निर्माण तकनीक सुधरे, तो जान-माल का नुकसान काफी कम किया जा सकता है.

बैठक का एक अहम फैसला यह रहा कि दोनों राज्य जल्द ही विभिन्न क्षेत्रों में समझौता ज्ञापन यानी एमओयू करेंगे. इससे ज्ञान, तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधनों का आदान-प्रदान एक तय ढांचे में होगावो भी  बिना किसी अनिश्चितता के.

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