रामनगरी अयोध्या में रामकथा से जुड़ी विरासत को सहेजने की दिशा में एक बड़ी पहल होती दिख रही है. रामपुर रजा लाइब्रेरी और अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के बीच ऐतिहासिक पांडुलिपियों को लेकर सहयोग की तैयारी शुरू हो गई है. रामपुर राजा लाइब्रेरी के डायरेक्टर डॉ. पुष्कर मिश्र ने रामकथा संग्रहालय के संयोजक संजीव कुमार से मुलाकात कर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे.

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दरअसल, कुछ समय पहले संग्रहालय के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने देशभर की संस्थाओं से अपील की थी कि उनके पास मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियां, पुरावशेष और संबंधित जानकारियां संग्रहालय के साथ साझा की जाएं. इसी कड़ी में रामपुर रजा लाइब्रेरी ने सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी की दुर्लभ राम साहित्य पांडुलिपियों की मूल प्रतियां तो नहीं, लेकिन उनकी प्रतीकात्मक ‘फैक्सिमाइल कॉपी’ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया है. ट्रस्ट अधिकारियों ने इस पर विचार शुरू कर दिया है और संग्रहालय के पूर्ण होने के बाद इन्हें अयोध्या लाने की योजना है.

फारसी भाषा में श्रीमद्भागवत गीता और अलंकृत पांडुलिपि

डॉ. पुष्कर मिश्र ने बताया कि उनके पुस्तकालय में फारसी भाषा में श्रीमद्भागवत का अनुवाद और उसकी अलंकृत पांडुलिपि मौजूद है, जिसमें सोने के पानी से कलात्मक कार्य किया गया है. इस अनमोल धरोहर और उससे जुड़े चित्रों की प्रदर्शनी अयोध्या में संयुक्त रूप से आयोजित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है.

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100 से अधिक रामायणों में से 15 का संकलन

उन्होंने बताया कि रामपुर रजा लाइब्रेरी में विश्व की 100 से अधिक रामायणों में से 15 का संकलन किया जा चुका है, और लक्ष्य है कि दुनिया भर की सभी रामायणों को एक मंच पर लाया जाए. उन्होंने कहा कि जानकारी के अनुसार अब तक विश्व में 40-45 रामायणों का प्रकाशन हो चुका है और अन्य के प्रकाशन व अनुवाद पर हमारा काम जारी है.

शुरुआती चरण में पांडुलिपियों के हस्तांतरण प्रक्रिया

हालांकि, पांडुलिपियों के हस्तांतरण को लेकर प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है, क्योंकि संसदीय नियमों के तहत मूल प्रतियों को परिसर से बाहर ले जाना संभव नहीं है. ऐसे में उनकी फैक्सिमाइल कॉपी ही अयोध्या लाई जा सकेगी. गौरतलब है कि ऐसी ही प्रतियां भारत सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कूटनीतिक उपहार के रूप में दी जा चुकी हैं.

रामकथा संग्रहालय और रामपुर रज़ा लाइब्रेरी के बीच यह संभावित साझेदारी आने वाले समय में अयोध्या को रामायण शोध और सांस्कृतिक धरोहर का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है.