उत्तराखंड में 5 अगस्त 2025 की वह भयावह शाम , धराली , हर्षिल और आस पास के क्षेत्रों में रहने वाले शायद ही कभी भूल पाएं.  खीर गंगा घाटी से अचानक नीचे उतरे मलबे और पानी के सैलाब ने देखते ही देखते पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया था. आज उस बात को ठीक एक साल पूरा हो चुका है और धराली में ज़िंदगी फिर रफ़्तार पकड़ने लगी है.

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हालांकि उस दिन की टीस लोगों के मन से अभी गई नहीं , जो तस्वीरें धराली की उस आपदा से सामने आई थी, उन्हें देखने वालों की तक पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी. देखते ही देखते धराली का पूरा  बाज़ार मलबे में तब्दील हो गया , त्रासदी में 19 लोगों की जान चली गई 18 लोग घायल हुए और 115 से ज़्यादा परिवार बेघर हो गए.  

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भारतीय सेना  , SDRF, NDRF, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन की टीमों ने मिलकर कई दिनों तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर 1400 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम किया. शुरुआत में यह जरूर माना गया था की यह त्रासदी बादल फटने की वजह से हुई थी. बाद में असल कहानी कुछ और ही निकली. 

ग्लेशियर के नीचे दबा खतरा और ISRO की रिपोर्ट 

शुरुआत में तरह-तरह की बातें की गयीं,  कुछ लोगों ने कहा कि यह बादल फटने का मामला है,  कुछ ने कहा कि ग्लेशियर टूटा और किसी ने कहा कि किसी ग्लेशियर के बीच बनी झील टूट कर नीचे आ गई. हालांकि इसरो के वैज्ञानिकों ने जो आपदा के कुछ महीनों तक इस क्षेत्र में रिसर्च की उसे यह सभी दावे ग़लत साबित हुए.

वैज्ञानिकों के मुताबिक़ श्रीकांता ग्लेशियर के नीचे कई वर्षों से जमा बर्फ का विशाल हिस्सा जिसे आइस पैच भी कहा जाता है बढ़ती गर्मी और तेजी से पिघलती बर्फ की वजह से कमजोर पड़ गया था. तीखी ढलान की वजह से अचानक टूक कर नीचे की और खिसक गया और रास्ते में मिट्टी और पत्थरों के साथ मिल कर विशालकाय मलबे में तब्दील हो गया. 

आंकड़े भी यह बताते हैं कि यह तबाही कितनी भयावह थी , जिस जगह पर आइस पैच टूटा वह क़रीब 5220 मीटर की उंचाई पर था जबकि धराली गांव मात्र 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यानि मलबे को धराली तक पहुंचने से पहले जो खड़ी गिरावट मिली उसने  इस मलबे की रफ़्तार को और भी खतरनाक बना दिया.

पुनर्निमाण , राज्य सरकार का दावा 

राज्य सरकार के अनुसार धराली के पुनर्निर्माण को लेकर बीते वर्ष में 33 करोड़ से ज़्यादा की धनराशि खर्च की गई है.जिसमें  16 करोड़ की धनराशि प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को लेकर लगाए गए,  जबकि 17 करोड़ की धनराशि सीधा आपदा प्रभावितों परिवारों को आर्थिक सहायता के रूप में दिए गए. 

पुनर्निर्माण का दायरा केवल सड़कों और भवनों तक सीमित नहीं रखा गया, इसे नयी फ़सल, सेब के बगीचों भेड़-बकरी पालन जैसे रोज़गार के साधन उपलब्ध करवाने के लिए भी इस्तेमाल किया गया. इस पूरे क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था दुरुस्त की गई, बिजली और पेयजल की नई लाइनें बिछाई गयीं. साथ ही इस घाटी की रीढ़ माने जाने वाले पर्यटन से धराली को दोबारा जोड़ने की कोशिश भी की गई. 

फिर खिलने लगे सेब के बगीचे 

धराली की पहचान हमेशा से गंगोत्री के मुख्य पड़ाव के रूप में और अपने उच्च गुणवत्ता के सेबों के लिए रही है. आपदा की वजह से यहां पर कई हेक्टायरों में फैली उपजाऊ ज़मीनें और सेब के बगीचे मलबे के नीचे दफ़्न हो गए.  ग्रामीणों ने एक बार फिर सेब की नई पौध लगाकर अपनी आजीविका को मज़बूत करने में जुटे हैं और सेब के कुछ गिने चुने बचे हुए बगीचे एक बार फिर सेब की ख़ुशबू से महकने लगे हैं.

गौरतलब है कि एक साल बाद धराली की रौनक वापस आने लगी है, दुकानें फिर खुलने लगी हैं और खेतों में एक बार फिर हरियाली दिखने लगी है. लेकिन आखिर कब तक धरली एक बार फिर अपने पुराने रूप में लौटेगा इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं ?

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