पहाड़ की कच्ची पगडंडियों से होकर गुजरने वाले सपने अब फोर लेन की चमचमाती सड़क पर दौड़ने लगे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर का लोकार्पण कर उत्तराखंड को एक ऐसा तोहफा दिया है, जो सिर्फ सड़क नहीं बल्कि लाखों जिंदगियों को बदलने की इबारत लिखने वाला है.

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जो दूरी कभी थकान और घंटों की जद्दोजहद मांगती थी, वह अब महज ढाई घंटे में तय हो जाएगी. दिल्ली की भागदौड़ से निकलकर देहरादून की ठंडी हवाओं तक पहुंचना अब सप्ताहांत का आसान मन बना लेने जैसा होगा. यह सिर्फ समय की बचत नहीं है, यह उत्तराखंड के दरवाजे को देश की मुख्यधारा से जोड़ने वाली एक ऐतिहासिक कड़ी है.

पर्यटन को मिलेंगे पंख

बेहतर कनेक्टिविटी का सबसे पहला और सबसे बड़ा असर पर्यटन पर दिखेगा. अब देश-विदेश के लाखों सैलानी आसानी से उत्तराखंड के उन कोनों तक भी पहुँच सकेंगे, जो पहले दूरी और समय की वजह से उनकी यात्रा सूची से बाहर रह जाते थे. साथ ही बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री तक की राह और सुगम होगी.

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किसानों के लिए खुला बाजार का नया दरवाजा

यह कॉरिडोर पहाड़ के किसान के लिए एक क्रांति लेकर आया है. अब तक जो उत्पाद दूरदराज के बाजारों तक पहुँचते-पहुँचते या तो खराब हो जाते थे या औने-पौने दामों पर बिकते थे, वे अब सीधे दिल्ली और बड़े शहरों की मंडियों तक ताजे पहुंच सकेंगे. 

हर्षिल के सेब जो अपनी मिठास के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं, जोशीमठ और चकराता की राजमा जिसका स्वाद बेजोड़ है.  पुरोला के लाल चावल जो पोषण से भरपूर हैं, रुद्रप्रयाग का बुरांश जूस जो पहाड़ की पहचान है. ये सब उत्पाद अब पहले से कम लागत और कम समय में बड़े बाजारों तक पहुँचेंगे. लॉजिस्टिक लागत घटेगी, बिचौलियों की भूमिका कम होगी और किसान की जेब में सीधे अधिक पैसा आएगा.

रोजगार की नई बयार — पलायन पर लगेगी लगाम

उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी रही है  पलायन. गाँव के गाँव खाली हो गए हैं. युवा रोजगार की तलाश में मैदानी शहरों की ओर पलायन करते रहे हैं. यह कॉरिडोर इस दर्द पर मरहम लगाने की उम्मीद लेकर आया है. इस परियोजना से जुड़े सहायक उद्योग तेजी से विकसित होंगे.

सिर्फ सड़क नहीं — एक सपने की नींव

दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर महज एक परिवहन परियोजना नहीं है. यह पहाड़ और मैदान के बीच की खाई को पाटने का एक सशक्त प्रयास है. यह उस उत्तराखंड के लिए उम्मीद की किरण है, जो अपनी प्राकृतिक समृद्धि के बावजूद विकास की दौड़ में पीछे रह जाता था.