उत्तराखंड के देहरादून में सोमवार को दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर के प्रस्तावित उद्घाटन से पहले एक महत्वपूर्ण मीडिया ब्रीफिंग आयोजित की गई, जिसमें इस महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और विकासात्मक पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई. यह कॉरिडोर 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित किया जाना प्रस्तावित है.

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मीडिया ब्रीफिंग के दौरान उत्तराखंड सरकार के वन मंत्री ने बताया कि यह परियोजना विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. उन्होंने कहा कि कॉरिडोर का लगभग 20 किलोमीटर हिस्सा उत्तर प्रदेश के शिवालिक वन प्रभाग और उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है, जो वन्यजीवों के लिए संवेदनशील क्षेत्र है. इसके बावजूद परियोजना को इस तरह डिजाइन किया गया है कि प्राकृतिक संतुलन को न्यूनतम नुकसान पहुंचे.

लगभग दो लाख पौधे लगे

वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, परियोजना के तहत उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में वन भूमि के हस्तांतरण के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है. कुल 165.5 हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 1.95 लाख पौधे लगाए गए हैं. इसके अलावा, 40 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि से वन एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए इको-रेस्टोरेशन के कार्य भी किए जा रहे हैं, जिनकी निगरानी एक विशेष मॉनिटरिंग कमेटी द्वारा की जा रही है.

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12 किमी एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर

इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत एशिया का सबसे लंबा लगभग 12 किलोमीटर का एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है, जिसे विशेष रूप से वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए विकसित किया गया है. इसके साथ ही हाथियों और अन्य वन्यजीवों के लिए अंडरपास और विशेष मार्ग बनाए गए हैं, ताकि उनकी आवाजाही निर्बाध बनी रहे.

वन्यजीवों को विशेष सुरक्षा

निर्माण कार्य के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है. शोर और प्रकाश प्रदूषण को कम करने के लिए साउंड बैरियर और लाइट बैरियर जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं. इन उपायों से वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पर न्यूनतम प्रभाव पड़ने की उम्मीद है.

19% ईंधन बचेगा

वन मंत्री ने बताया कि इस कॉरिडोर के निर्माण से मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी आएगी और विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर आनुवांशिक आदान-प्रदान (जीन पूल) संभव हो सकेगा, जो जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, अगले 20 वर्षों में लगभग 2.44 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आने का अनुमान है, जो लाखों पेड़ों द्वारा एक वर्ष में अवशोषित कार्बन के बराबर है. साथ ही इस परियोजना से करीब 19 प्रतिशत ईंधन की बचत भी होगी,

परियोजना से न केवल यात्रा समय में कमी आएगी, बल्कि पर्यटन, व्यापार और स्थानीय रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी. इससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है. अंततः, सरकार का मानना है कि दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास का एक आदर्श मॉडल बनकर उभरेगा, जो भविष्य की आधारभूत परियोजनाओं के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा.