बुंदेलखंड की प्यासी धरती के लिए सिंचाई परियोजनाएं केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक तकदीर बदलने का जरिया हैं. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र (झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट) में जल प्रबंधन और सिंचाई के क्षेत्र में अहम बदलाव हो रहे हैं.

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सूखी धरती पर लौट रही हरियाली

झांसी/महोबा. कभी सूखे और पलायन के लिए पहचाना जाने वाला बुंदेलखंड अब 'जल आत्मनिर्भरता' की नई इबारत लिख रहा है. उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से इस क्षेत्र में कई बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को धरातल पर उतारा गया है, जिससे न केवल खेती का रकबा बढ़ा है बल्कि किसानों की आय में भी सुधार हुआ है.

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केन-बेतवा लिंक

बुंदेलखंड के लिए सबसे महत्वाकांक्षी योजना केन-बेतवा लिंक परियोजना है. लगभग ₹44,605 करोड़ की इस योजना का लक्ष्य केन नदी के अधिशेष पानी को बेतवा बेसिन में स्थानांतरित करना है. इस परियोजना से उत्तर प्रदेश के झांसी, बांदा, ललितपुर और महोबा जिलों को सीधा लाभ मिलेगा. अनुमान है कि इससे पूरे क्षेत्र में करीब 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 62 लाख लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध होगा.

अर्जुन सहायक परियोजना

हाल ही में पूर्ण हुई अर्जुन सहायक परियोजना (लागत ₹2,655 करोड़) इस क्षेत्र के लिए 'गेम चेंजर' साबित हुई है. धसान नदी पर बनी इस परियोजना से महोबा, हमीरपुर और बांदा के 168 गांवों के लगभग 1.5 लाख किसानों को लाभ मिल रहा है. इससे करीब 44,000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पर सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित हुई है.

प्रमुख बांध और नई पहल

  • भावनी बांध परियोजना: ललितपुर में ₹512 करोड़ की लागत से तैयार इस बांध से 3,800 हेक्टेयर क्षेत्र में रबी और खरीफ की फसलों के लिए पानी सुनिश्चित किया गया है.
  • स्प्रिंकलर सिंचाई: पानी की बर्बादी रोकने के लिए सरकार 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' के तहत माइक्रो-इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम को बढ़ावा दे रही है.
  • 95 नई परियोजनाएं: हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में 95 नई नहर परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनका एक बड़ा हिस्सा बुंदेलखंड के सिंचाई नेटवर्क को मजबूत करने में खर्च होगा.

आर्थिक प्रभाव

सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से बुंदेलखंड में अब किसान साल में दो से तीन फसलें ले पा रहे हैं. मटर, चना और औषधीय पौधों की खेती में इस क्षेत्र ने नई ऊंचाइयां छुई हैं. पानी की उपलब्धता ने यहां से होने वाले पलायन को भी कम किया है, क्योंकि अब रोजगार के अवसर खेतों में ही उपलब्ध हैं.