Gulzar की कविताओं में नजर आता है उनके मन में बसा बंटवारे का दर्द
preetip | 11 Jan 2020 09:35 AM (IST)
गीतकार गुलज़ार को पूरी दुनिया जानती है। उन्होंने अपनी कविताओं और नग्मों से ना जाने कितने कलाकारों को सुपरस्टार बनाया
बॉलीवुड इंडस्ट्री के ऐसे कलाकार जिनके गीत, कविताएं कई दशकों से लोगों के लिए किसी नायाब तोहफे से कम नहीं है। लेकिन कहते हैं ना हर दर्द भला नगमें के पीछे लिखने वाले का खुद का नर्द होता है। कुछ यादें ऐसी होती हैं जो समय के साथ-साथ धुंधली तो जरूर हो जातीं हैं लेकिन कभी मिटती नहीं। इन यादों का बहुत गहरा असर रहता हैं उस शख्स के दिलों दिमाग पर जो ऐसी यादों को जीता है। ऐसा ही एक हादसा गीतकार, लेखक, पटकथा लेखक,कवि गुलज़ार (Gulzar) के साथ भी हुआ। जिसका नाम था बंटवारा और इसी बंटवारे का दर्द उनकी हर कविता हर कहानी में झलकता है। आज की इस खास स्टोरी में हम आपको गुलज़ार की जिन्दगी के बारे में पहलुओं को उजागर करेंगे, जिनके बारे में शायद ही आप पहले जानते होंगे।
जब गुलज़ार छोटे थे तब उन्हें पढ़ाई में काफी दिलचस्पी थी। लेकिन उनके बड़े भाई और पिता ने उन्हें पढ़ने नहीं दिया। क्योंकि उस वक्त उनके घर की आर्थिक स्थिती बहुत खराब थी। जिसके बाद गुलज़ार अपना मुकाम हासिल करने के लिए मुंबई चले आए। मुंबई में अपनी जगह बनाने में गलज़ार को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। यहां तक की उन्होंने पैसों के लिए उन्होंने एक गैराज में मेकेनिक का काम भी किया। बंटवारे का दुख, तंगहाली में गुजारी जिन्दगी, पढ़ाई पूरी ना करने का गम अपने इन दुखों को गुलज़ार ने कविताओं में उतार दिया।
बंटवारे के समय गुलज़ार के पिताजी का देहांत दिल्ली में हुआ उस वक्त वो मुंबई में काम कर रहे थे। लेकिन उनके परिवार वालों ने ये खबर गुलज़ार तक पहुंचने नहीं दी। हांलाकि उनके बड़े भाई भी उस वक्त मुंबई में ही रहते थे जैसे ही बड़ें भाई को पिता के देहांत की खबर लगी वो तुरंत हवाई जहाज से दिल्ली पहुंच गए। वहीं गुलज़ार को अपने पिता की मौत का पता करीबी रिश्तेदार से कई दिनों बाद हुई। जब वो दिल्ली पहुंचे तब तक सब खत्म हो चुका था। लेकिन आखिरी वक्त में अपने पिता को ना देख पाने का दुख गुलज़ार के दिल में हमेशा रहा।
जिस वक्त देश का बंटवारा हो रहा था तब गुलज़ार सिर्फ 11 साल के थे। वो मंज़र उनके दिलों दिमाग पर गहरा असर कर गया। उनकी कई कविताओं में विभाजन का दर्द खूब छलकता है। एक बार गुलज़ार ने अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि 'बंटवारा मेरी लेखनी का बहुत ही अहम हिस्सा है, क्योंकि अपने बचपन में मैं वो दौर देख चुका हूं जिसका असर आज तक है। आज भी मैं जब कहीं कोई सांप्रदायिक दंगे देखता हूं, तो मुझे बंटवारे का मंजर दिखाई देता है और बहुत तकलीफ होती है।