नितिन नवीन के हल्द्वानी दौरे से BJP ने फूंका चुनावी बिगुल, प्लान तैयार!
नितिन नबीन का दो दिवसीय हल्द्वानी दौरा महज संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं दिखता. प्रदेश कार्यसमिति से ‘बूथ जीतो-चुनाव जीतो’, हारी हुई सीटों पर फोकस, युवा-दलित संपर्क और 2027 में बड़ी जीत का लक्ष्य रखा.

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है. लेकिन बीजेपी ने जिस तरह अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के दो दिवसीय दौरे का केंद्र हल्द्वानी को बनाया, उससे संकेत साफ हैं कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर रही है. 9 सितंबर को विस्तारित प्रदेश कार्यसमिति, पदाधिकारियों और कोर कमेटी की बैठकें हुईं. इसके अगले दिन कार्यक्रम संगठन की बंद बैठकों से निकलकर समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचा. कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय होने और केंद्र-राज्य सरकार की उपलब्धियां लेकर जनता के बीच जाने का संदेश दिया.
यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हल्द्वानी पिछले करीब एक महीने से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ विवाद का राजनीतिक केंद्र बना हुआ है. यानी बीजेपी ने उस जमीन पर अपनी राष्ट्रीय राजनीति उतारी, जहां कांग्रेस दलित सम्मान का मुद्दा खड़ा करने की कोशिश कर रही है.
सहारनपुर मस्जिद केस: AIMIM प्रवक्ता बोले- कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी
संगठन की बैठक नहीं, 2027 का रोडमैप
नितिन नबीन ने अपने संबोधन में 2027 को सीधे सामने रखा. उनका संदेश था कि मजबूत संगठन होने के बावजूद बीजेपी को अति-आत्मविश्वास में नहीं रहना है और ‘बूथ जीतो, चुनाव जीतो’ के मंत्र के साथ काम करना होगा. कार्यसमिति में 2027 की रणनीति, बूथ की मजबूती, पहाड़-मैदान का समीकरण, युवा और महिला मतदाता, सरकार की उपलब्धियों का प्रचार और विपक्ष के नैरेटिव का जवाब जैसे विषय सामने आए.
इसीलिए इसे केवल नियमित संगठनात्मक दौरा कहना तस्वीर को अधूरा देखना होगा. नितिन नबीन ने खुद उत्तराखंड से चुनावी शंखनाद की बात कही और 2027 की जीत को 2029 के लोकसभा चुनाव से जोड़ दिया. राजनीतिक अर्थ साफ है—बीजेपी उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की लड़ाई को अभी से संगठन के एजेंडे पर ला रही है.
एक महत्वपूर्ण रणनीति उन 23 विधानसभा सीटों को लेकर भी सामने आई है, जिन्हें बीजेपी पिछला चुनाव नहीं जीत सकी थी. पार्टी की योजना इन क्षेत्रों में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं के रात्रि प्रवास और सीधे जमीनी संवाद की है. यानी अब केवल अपनी मजबूत सीट बचाना नहीं, विपक्ष के कब्जे वाली सीटों में सेंध लगाना भी रणनीति का हिस्सा है.
युवाओं को अलग से साधने की कोशिश
दौरे के दूसरे दिन का युवा संवाद भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है. नितिन नबीन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने युवाओं से करियर, रोजगार, स्वरोजगार, स्टार्टअप और तकनीकी शिक्षा पर बातचीत की. बीजेपी अध्यक्ष ने युवाओं को विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा, जबकि धामी ने राज्य सरकार की रोजगार और स्वरोजगार नीतियों को सामने रखा.
इसका चुनावी अर्थ भी है. बीजेपी अपनी पुरानी वैचारिक और संगठनात्मक ताकत के साथ अब युवा मतदाता—विशेषकर पहली या दूसरी बार वोट देने वाली पीढ़ी—तक विकास, रोजगार और अवसर की भाषा में पहुंचना चाहती है.
‘शुद्धिकरण’ विवाद के बीच दलित राजनीति पर सीधा जवाब
नितिन नबीन के दौरे की सबसे दिलचस्प परत दलित राजनीति है. खरगे की 8 अगस्त की हल्द्वानी सभा के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित धार्मिक अनुष्ठान को कांग्रेस ने ‘शुद्धिकरण’ बताते हुए दलित अपमान से जोड़ा. राहुल गांधी ने भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाया. दूसरी ओर बीजेपी इस आरोप को स्वीकार करने के बजाय कांग्रेस के दलित इतिहास पर ही सवाल खड़े कर रही है.
नितिन नबीन ने हल्द्वानी से कांग्रेस पर दलितों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और आंबेडकर, जगजीवन राम तथा संत रविदास का जिक्र करते हुए बीजेपी को दलित सम्मान की राजनीति से जोड़ने की कोशिश की. अगले दिन उनका दलित बूथ अध्यक्ष के घर जाना और जलपान करना भी इसी व्यापक राजनीतिक संदेश के संदर्भ में देखा जा सकता है.
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि बीजेपी ने खरगे विवाद से बचने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसी मुद्दे पर कांग्रेस के नैरेटिव का काउंटर-नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की.
धामी का ‘दोनों तरफ एक्शन’- यहीं बदलती है कहानी
इस पूरे विवाद में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की स्थिति सबसे दिलचस्प है. पहले राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में मुकदमा दर्ज हुआ. शिकायत में राहुल गांधी की 29 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर की गई टिप्पणियों को आधार बनाया गया. राहुल के खिलाफ BNS और SC/ST एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया गया.
इसके बाद 8 सितंबर को उसी मूल ‘शुद्धिकरण’ प्रकरण में अज्ञात लोगों के खिलाफ भी FIR दर्ज हुई. पुलिस के मुताबिक पूरे प्रदेश से करीब 80 शिकायतें/याचिकाएं मिली थीं. अधिवक्ता अंजू की शिकायत के आधार पर BNS की धारा 196, 299 और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) में मुकदमा दर्ज हुआ और जांच एसपी क्राइम को सौंपी गई.
यही घटनाक्रम धामी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है. एक तरफ राहुल गांधी के खिलाफ मामला दर्ज होने से बीजेपी समर्थक वर्ग को संदेश गया कि सरकार कांग्रेस के आरोपों के सामने रक्षात्मक नहीं है. दूसरी तरफ कथित शुद्धिकरण करने वालों के खिलाफ भी FIR होने से कांग्रेस के इस आरोप की धार कुछ हद तक कम करने की कोशिश हुई कि सरकार मूल घटना पर कार्रवाई नहीं कर रही.
क्या इससे धामी का कद बढ़ा?
यहां तथ्य और राजनीतिक विश्लेषण को अलग रखना जरूरी है. यह कहना अभी तथ्यात्मक रूप से संभव नहीं कि इन FIR के कारण बीजेपी नेतृत्व में धामी का औपचारिक कद बढ़ गया है. लेकिन नितिन नबीन के दौरे से निकले संकेत धामी के लिए प्रतिकूल भी नहीं दिखाई देते.
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मंच से धामी सरकार के काम, खासकर समान नागरिक संहिता (UCC) का उल्लेख किया और कहा कि मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में प्रदेश आगे बढ़ रहा है. साथ ही बीजेपी 2027 के अभियान में सरकार के ‘रिपोर्ट कार्ड’ को प्रमुख हथियार बनाने जा रही है. इस लिहाज से धामी फिलहाल समस्या के रूप में नहीं, बल्कि बीजेपी के चुनावी मॉडल के एक प्रमुख चेहरे के रूप में दिखाई देते हैं.
असहज हुई BJP या धामी का ‘मास्टर स्ट्रोक’?
‘मास्टर स्ट्रोक’ राजनीतिक भाषा में आकर्षक शब्द है, लेकिन इसे निष्कर्ष की तरह लिखना जल्दबाजी होगी. बेहतर राजनीतिक व्याख्या यह है कि धामी सरकार ने इस विवाद में दोनों सिरों पर कानूनी कार्रवाई होने देकर बीजेपी के लिए एक संभावित राजनीतिक जोखिम को संतुलित करने की कोशिश की है.
अगर केवल राहुल गांधी पर मुकदमा रहता और मूल कथित शुद्धिकरण की शिकायत पर कार्रवाई नहीं होती, तो कांग्रेस इसे दलित सम्मान बनाम बीजेपी सरकार के रूप में ज्यादा आक्रामक ढंग से पेश कर सकती थी. दूसरी FIR के बाद बीजेपी के पास जवाब है कि मामला पुलिस जांच के अधीन है और कानून अपना काम कर रहा है. हाईकोर्ट में भी राज्य सरकार ने निष्पक्ष जांच और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का आश्वासन दिया था.
यानी जिस मुद्दे से बीजेपी असहज हो सकती थी, उसी मुद्दे को नितिन नबीन ने हल्द्वानी पहुंचकर उलटने की कोशिश की—कांग्रेस पर ही दलितों के अपमान का इतिहास होने का आरोप लगाया. इसे धामी सरकार की कानूनी कार्रवाई और राष्ट्रीय नेतृत्व के राजनीतिक हमले की दोहरी रणनीति के रूप में पढ़ा जा सकता है.
हल्द्वानी ही क्यों? कुमाऊं से बड़ा संदेश
स्थान का चुनाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. पार्टी चाहती तो चुनावी तैयारी का बड़ा कार्यक्रम देहरादून में कर सकती थी. लेकिन हल्द्वानी कुमाऊं का राजनीतिक प्रवेश द्वार है और यही शहर हालिया खरगे विवाद का केंद्र भी बना. यहां राष्ट्रीय अध्यक्ष की प्रदेश कार्यसमिति, कोर कमेटी, दलित कार्यकर्ता के घर संपर्क, युवा संवाद और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों का एक साथ होना बताता है कि बीजेपी संगठन, सामाजिक समीकरण और विपक्ष के नैरेटिव—तीनों मोर्चों पर एक साथ उतर रही है.
इसीलिए नितिन नबीन का यह दौरा केवल ‘खरगे विवाद को बैलेंस’ करने के लिए आया दौरा नहीं माना जा सकता. कार्यक्रम की तैयारी पहले से चुनाव और संगठन को ध्यान में रखकर थी. लेकिन खरगे-शुद्धिकरण विवाद ने इस दौरे को एक अतिरिक्त राजनीतिक अर्थ जरूर दे दिया और बीजेपी ने उस मौके को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की.
चुनावी बिगुल भी, नैरेटिव की लड़ाई भी
हल्द्वानी से तीन संदेश स्पष्ट निकलते हैं. पहला, बीजेपी ने 2027 की तैयारी औपचारिक रूप से तेज कर दी है और बूथ से लेकर हारी हुई सीटों तक माइक्रो प्लानिंग शुरू हो रही है. दूसरा, युवा, महिला और दलित मतदाताओं को अलग-अलग राजनीतिक संदेश के जरिए जोड़ने की रणनीति सामने आ रही है. तीसरा, कांग्रेस जिस ‘शुद्धिकरण’ विवाद को बीजेपी के खिलाफ दलित सम्मान का बड़ा मुद्दा बनाना चाहती है, बीजेपी अब उसी मैदान पर कांग्रेस को घेरने की रणनीति अपना रही है.
इस पूरी तस्वीर के बीच पुष्कर सिंह धामी फिलहाल कमजोर पड़ते नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के केंद्र में दिखाई देते हैं. उनके लिए असली राजनीतिक लाभ यह है कि विवाद में कानून की कार्रवाई दोनों दिशाओं में हुई, जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने हल्द्वानी आकर राजनीतिक मोर्चा खुद संभाला और धामी सरकार की उपलब्धियों को सार्वजनिक समर्थन दिया.
इसे अभी ‘धामी का मास्टर स्ट्रोक’ घोषित करना विश्लेषण से ज्यादा राजनीतिक विशेषण होगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिस विवाद में सरकार के फंसने की गुंजाइश थी, धामी ने फिलहाल उसे अपने खिलाफ एकतरफा नैरेटिव नहीं बनने दिया. अब 2027 की लड़ाई में बीजेपी की कोशिश यही होगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड आगे, संगठन बूथ पर और कांग्रेस के हर बड़े नैरेटिव का जवाब उसी राजनीतिक जमीन पर दें.
अक्षत मामले में CJI की फटकार के बाद पुलिस ने जारी किया बयान, CJP के दावों को बताया गलत





















