उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ विधानसभा सीट केवल एक चुनावी क्षेत्र नहीं बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में भावनात्मक और धार्मिक पहचान का प्रतीक भी है. चार धामों में शुमार केदारनाथ मंदिर इसी क्षेत्र का हिस्सा है और यही वजह है कि यहां का हर चुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहता.
धर्म, आस्था और तीर्थयात्रा से जुड़े मुद्दे भी उतने ही अहम हो जाते हैं. जितने सड़क, बिजली और पलायन , गढ़वाल हिमालय की गोद में स्थित पूर्ण रूप से पहाड़ी क्षेत्र है, जहां कुछ छोटे कस्बों को छोड़कर बड़ा शहरीकरण नहीं दिखता. 2024 के उपचुनाव के आंकड़ों के मुताबिक यहां कुल मतदाताओं की संख्या करीब 90 हजार के आसपास थी.
जातीय समीकरण और क्या कहता है चुनावी इतिहास?
जातीय समीकरण की बात करें तो इस सीट पर राजपूत समुदाय की संख्या सबसे अधिक है. उसके बाद ओबीसी वर्ग वहीं अनुसूचित जाति और जनजाति के मतदाता भी अच्छी तादाद में हैं जबकि इस सीट पर ब्राह्मण मतदाता संख्या में सबसे कम हैं मुस्लिम आबादी यहां लगभग ना के बराबर है.
केदारनाथ सीट को किसी एक पार्टी का किला कहना ठीक नहीं होगा. राज्य गठन के बाद से अब तक बीजेपी चार और कांग्रेस दो बार इस सीट पर जीत दर्ज कर चुकी है हालांकि इस सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी भी राष्ट्रीय पार्टियों की नींद उड़ाते नजर आते हैं.
यूपी में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, काशी विश्वनाथ मंदिर के CEO हटाए गए
साल 2002 में पहला बार केदारनाथ सीट पर हुआ था चुनाव
राज्य गठन के बाद केदारनाथ सीट पर वर्ष 2002 में पहला चुनाव हुआ, इस दौरान बीजेपी प्रत्याशी आशा नौटियाल का दबदबा क्षेत्र में साफ तौर से देखा गया. 13080 वोटों से आशा नौटियाल ने यह सीट अपने नाम की वहीं दूसरे स्थान पर कांग्रेस से प्रत्याशी शैला रानी रावत रही जिन्हें 9615 वोट मिले.
वर्ष 2007 के चुनाव में भी यह सीट बीजेपी के नाम रही , एक बार फिर आशा नौटियाल 16971 वोट लाकर इस क्षेत्र की विधायक बनी कांग्रेस ने इस बार सीट जीतने के लिए शैला रानी रावत का टिकट काट कर कुंवर सिंह नेगी को टिकट दिया, हालांकि कांग्रेस का यह पैंतरा काम नहीं आया कुंवर सिंह नेगी को इस चुनाव में 13992 वोट मिले.
2012 में हुआ बदलाव, बीजेपी ने 19960 वोटों से की जीत दर्ज
साल 2007 के चुनाव में भले ही कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, हालांकि उसके परिणाम इस और इशारा जरूर करने लगे थे कि अब जानता बदलाव चाहती है. साल 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर शैला रानी रावत को अपना प्रत्याशी घोषित किया जब कि बीजेपी ने अपनी सिटिंग एमएलए आशा नौटियाल पर दांव खेला. हालांकि इस सीट पर दो बार विधायक रह चुकी आशा नौटियाल इस चुनाव में यह सीट हार गई , शैला रानी रावत को 2012 के चुनाव में 19960 वोट मिले और वह इस क्षेत्र की विधायक चुनी गई दूसरे स्थान पर 17632 वोटों के साथ आशा नौटियाल रही.
2013 के बाद से ही पूरे देश में मोदी लहर दौड़ रही थी और वर्ष 2016 में उत्तराखंड में बड़ा दलबदल हुआ तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से बगावत कर शैला रानी रावत सेमत कांग्रेस के 9 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी को यह उम्मीद थी कि अब यह नौ सीटें बीजेपी के खेमे में ही आएंगी हालांकि हुआ ठीक इसका उलट , 2017 के चुनाव में बीजेपी ने आशा नौटियाल का टिकट काट कर शैला रानी रावत को अपने टिकट से चुनावी मैदान में उतारा जब की कांग्रेस ने बगावत की मार झेल मनोज रावत को पार्टी का टिकट दिया.
साल 2022 में शैला रानी रावत बंपर जीत से बनी विधायक
हालांकि इस चुनाव में बगावत बस कांग्रेस के साथ ही नहीं बल्कि बीजेपी को नुकसानदायक साबित हुई. टिकट काटने से नाराज आशा नौटियाल ने इस चुनाव में निर्दलीय लड़ने का फैसला लिया इन सभी राजनैतिक पैंतरा से अलग चुनाव के परिणाम कुछ और ही कह गए मनोज रावत 13906 वोटों के साथ इस क्षेत्र के विधायक चुने गए और 2017 में यह सीट कांग्रेस के खेमे में गई. इस चुनाव में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि दूसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप सिंह रावत 13037 वोटों के साथ रहे. वहीं आशा नौटियाल 11786 वोटों के साथ तीसरे जबकि बीजेपी से शैल रानी रावत 11472 वोटों के साथ चौथे स्थान पर रही.
बीजेपी ने 2022 के चुनाव में एक बार फिर शैला रानी रावत पर भरोसा जताते हुए उन्हें पार्टी का टिकट सौंपा. वहीं कांग्रेस में एक बार फिर मनोज रावत पर भरोसा जताया और पिछले चुनाव में टिकट काटने से नाराज आशा नौटियाल को भी बीजेपी ने अपने खेमे में शामिल कर लिया. नतीजा यह हुआ कि 2022 में शैला रानी रावत बंपर 21886 वोट पाकर इस क्षेत्र से विधायक बनी. दूसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप सिंह रावत रहे जबकि कांग्रेस के मनोज रावत 12557 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे.
2024 में विधायक शैला रानी की मौत के बाद हुआ उपचुनाव
2024 में विधायक शैला रानी रावत की आकस्मिक मृत्यु हो गई , जिसके बाद इस सीट पर उपचुनाव आयोजित हुए बीजेपी ने आशा नौटियाल को पार्टी टिकट देकर मैदान में उतारा जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर मनोज रावत पर दांव खेला. उपचुनाव में भी बीजेपी ने इस सीट पर बीजेपी में बाजी मारी आशा नौटियाल को इस चुनाव में 23814 वोट मिले जबकि कांग्रेस के मनोज रावत को 18192 वोट मिले.
अगला विधानसभा चुनाव अभी कुछ वक्त दूर है, हालांकि दोनों प्रमुख दलों में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. बीजेपी मौजूदा विधायक आशा नौटियाल को ही दोबारा मैदान में उतार सकती है जबकि कांग्रेस में पूर्व विधायक मनोज रावत की वापसी की अटकलें लगाई जा रही हैं. वहीं 2017 और 2022 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जिस तरह बीजेपी कांग्रेस दोनों को ही कड़ी टक्कर दी थी उससे साफ है कि यह सीट किसी एक पार्टी के पक्ष में स्थिर नहीं है. साल 2027 का चुनाव इस सीट के लिए क्या लेकर आया है देखना दिलचस्प होगा.
'हम नहीं मानते', UCC पर बोले बरेली के मौलाना शाहबुद्दीन रजवी
