बिहार के नतीजे के बाद यूपी की सियासत में हलचल हो गई है. बिहार में MY समीकरण टूटा और यूपी में सपा की रणनीति भी हिल गई है. अब अखिलेश यादव दलित वोट बैंक पर एक बड़ा दांव खेलने जा रहे हैं. 6 दिसंबर को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में सपा दलितों की शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में है. इसी के साथ सवर्णों पर टिप्पणी करने पर पार्टी ने कड़ी रोक लगा दी है. यानी सपा ने अपनी राजनीति की दिशा बदली है. फॉर्मूला PDA वही है लेकिन टारगेट अब पूरा सामाजिक समीकरण दलित, ओबीसी और फॉरवर्ड, तीनों को साथ लाने का है.

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बिहार का सियासी भूचाल अब यूपी की जमीन हिला रहा है. बिहार में M-Y मॉडल दरक गया और अब यूपी में समाजवादी पार्टी अपने PDA मॉडल को “री-डिजाइन” कर रही है. 6 दिसंबर को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में सपा दलितों की ताकत दिखाना चाहती है और संदेश साफ है. दलित अब बसपा का नहीं सपा का वोट बैंक बनेगा. लेकिन इसी के साथ सपा एक और चुपचाप बदलाव कर चुकी है जिसमें सवर्णों पर टीका-टिप्पणी बंद. सपा के नेताओं को साफ निर्देश दिया है, PDA आगे रखो, लेकिन फॉरवर्ड समाज को नाराज मत करो.

सपा विधायक ने समझाया PDA का मतलब

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का कहना है P का मतलब पिछड़ा, D यानी दलित और A के तीन अर्थ अल्पसंख्यक, आधी आबादी और अगड़ी जाति. सपा सबके न्याय-सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है. दलित समाज बसपा छोड़ चुका है और अब समाजवादी पार्टी के साथ है. 6 दिसंबर को रिकॉर्ड संख्या में दलित शामिल होंगे.

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बीजेपी बोली- सपा अब कर रही दिखावे का कार्यक्रम

वहीं, विपक्ष को सपा की यह सक्रियता चुनावी घबराहट लग रही है. बीजेपी सपा पर पुरानी दलित विरोधी राजनीति का आरोप फिर उठा रही है और कह रही है कि सपा अब सिर्फ दिखावे का कार्यक्रम कर रही है. BJP MLC लालजी निर्मल कहते हैं कि अखिलेश यादव पहले दलित समाज से माफी मांगें. अंबेडकर के नाम हटाए गए, आरक्षण पर चोट की गई , अब अचानक दलित प्रेम क्यों?यह सिर्फ चुनावी स्टंट है. दलित समाज इनसे नाराज़ है और रहेगा.

विश्लेषक भी मानते हैं कि बिहार ने जो मैसेज दिया है, उसे समझना होगा. यूपी में यादवों की संख्या कम है और दलित-ओबीसी के साथ-साथ फॉरवर्ड वोटों की अनदेखी करने वाली कोई भी राजनीति सफल नहीं हुई. मुलायम सिंह जब राजनीति करते थे तो यादवों के साथ-साथ ब्राह्मण और ठाकुर नेतृत्व को भी बराबर सम्मान देते थे. 

राजनीतिक विश्लेषकों ने क्या कहा?

मायावती ने भी जब फुल मेजॉरिटी ली तो फॉरवर्ड को साथ रखा. कांग्रेस ने भी और बीजेपी आज उसी फॉर्मूले पर खड़ी है. राजनीतिक विश्लेषक योगेश मिश्र कहते हैं बिहार ने साफ संदेश दिया सिर्फ MY से काम नहीं चलेगा. सपा अगर 2027 में जीतना चाहती है तो ठाकुर-ब्राह्मण को भी बराबर प्रतिनिधित्व देना होगा. PDA बनाम फॉरवर्ड यह रणनीति खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी है.दलित और यादव का एक मंच पर टिकना भी मुश्किल है.

बिहार के नतीजों ने जो संदेश दिया उसने यूपी की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है. अब समाजवादी पार्टी PDA के नए अवतार के साथ मैदान में है जहां दलितों को केंद्र में रखकर,ओबीसी को जोड़कर,और फॉरवर्ड को नाराज न करके, 2027 की दिशा तय करने की तैयारी है. लेकिन असली टेस्ट अभी बाकी है 6 दिसंबर की रैली ही बताएगी कि दलित समाज वाकई सपा की ओर बढ़ रहा है, या फिर यह पूरा अभियान सिर्फ एक चुनावी कवायद बनकर रह जाएगा.