धार भोजशाला केस: HC के फैसले पर फलहारी बाबा का बड़ा बयान, 'कृष्ण जन्मभूमि और काशी में...'
Bhojshala Case: जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने अपने फैसले में पुरातात्विक प्रमाणों के साथ ही इस बात को भी आधार बनाया है कि हिंदू वहां लगातार पूजा करते आ रहे थे.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा धार भोजशाला मामले में फैसले के बाद अब उत्तर प्रदेश में काशी और मथुरा के मामले की चर्चा शुरू हो गई है. मथुरा में दिनेश शर्मा उर्फ फलाहारी बाबा ने एक बयान के जरिए बड़ा दावा किया है. उन्होंने संकेत दिए हैं कि धार भोजशाला के निर्णय को आधार बनाकर काशी और मथुरा के मामले में आगे बढ़ा जाएगा.
शर्मा ने कहा कि न्यायालय का यह सराहनीय निर्णय, जो तथ्यों और सबूतों पर आधारित है, हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हिंदू पक्ष के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में सामने आया है.
फलाहारी बाबा ने कहा है कि इस फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चल रहे कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मामले में एक आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, जहां न्यायालय ने वर्शिप एक्ट को प्रभावी नहीं माना है. इन तथ्यों को देखते हुए, यह निर्णय कृष्ण जन्मभूमि और काशी में चल रहे मुद्दों पर भी प्रभाव डालेगा. ऐसी उम्मीद है कि अयोध्या में भगवान राम के मंदिर की स्थापना की तरह ही, काशी और मथुरा में भी हिंदू पक्ष को विजय प्राप्त होगी, जिससे भगवान कृष्ण के लिए एक भव्य और दिव्य मंदिर का निर्माण संभव हो सकेगा.
हाईकोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने अपने फैसले में पुरातात्विक प्रमाणों के साथ ही इस बात को भी आधार बनाया है कि हिंदू वहां लगातार पूजा करते आ रहे थे. कोर्ट ने कहा है कि पुरातत्व एक विज्ञान है. उसके निष्कर्ष को झूठलाया नहीं जा सकता है. इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि भोजशाला 11वीं सदी में परमार वंश के राजाओं की तरफ से स्थापित संस्कृत शिक्षा का केंद्र और माँ वाग्देवी सरस्वती का मंदिर था.
बता दें मुस्लिम पक्ष भोजशाला परिसर को कमालुद्दीन मस्जिद बता कर हिंदुओं के दावे का विरोध कर रहा था. उसने 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का भी हवाला दिया था और कहा था कि किसी भी धार्मिक स्थान का चरित्र बदला नहीं जा सकता है. इसके जवाब में हिंदू फ्रंट ऑफ जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी थी कि भोजशाला परिसर एक ASI संरक्षित स्मारक है. इसमें प्लेसेस आफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है.
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को स्वीकार किया है कि पूरा परिसर एक संरक्षित स्मारक है जो की आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (ASI) के दायरे में आता है. कोर्ट ने कहा है कि ASI परिसर के संरक्षण का काम जारी रखे. केंद्र सरकार और ASI वहां धार्मिक गतिविधियों के प्रबंधन की व्यवस्था बनाएं और संस्कृत शिक्षा का केंद्र स्थापित करने के लिए भी कदम उठाएं.

























