इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि चयन प्रक्रिया में अनुचित लाभ लेने के लिए भर्ती के आवेदन पत्र में जानबूझकर अधिक अंक भरने से एक अभ्यर्थी की नियुक्ति मौलिक रूप से अवैध हो जाती है. अदालत ने कहा कि इस प्रकार से ऐसे अभ्यर्थी विबंधन के लाभ की मांग नहीं कर सकते क्योंकि प्रारंभ से ही यह नियुक्ति दागदार है. 

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न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह निर्णय देते हुए अवधेश कुमार चौधरी और छह अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिकाएं खारिज कर दीं. कोर्ट ने कहा, “किसी भी तर्क के आधार पर ऐसे कृत्य को महज मानवीय त्रुटि या अनजाने में हुई गलती नहीं माना जा सकता क्योंकि इससे अन्य योग्य उम्मीदवारों की तुलना में अनुचित लाभ मिलता है और चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रभावित होती है.”

तथ्यों के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं ने सहायक अध्यापकों के पदों के लिए आवेदन किया था और भर्ती परीक्षा, 2019 के परिणाम में सफल घोषित किए गए थे जिसके बाद उन्होंने नियुक्ति के लिए आवेदन किया और कुशीनगर जिले में उनकी नियुक्ति की गई.

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अधिक अंक दिखाने पर सेवा समाप्त की

कुछ आपत्तियां के चलते याचिकाकर्ताओं को हलफनामा दाखिल करने को कहा गया और उस पर विचार करने के बाद उनके नियुक्ति पत्र बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी किए गए थे. पांच साल काम करने के बाद इनकी सेवाएं नौ मई, 2025 को बेसिक शिक्षा बोर्ड के सचिव द्वारा पारित आदेशों के तहत समाप्त कर दी गईं. आदेश में आवेदन पत्र में अधिक अंक दिखाए जाने को सेवा समाप्ति का आधार बनाया गया.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने हलफनामा के जरिए सही सूचना दी थी और पांच साल तक उनके कामकाज को लेकर कोई शिकायत नहीं की गई. इसलिए बर्खास्तगी का दंड जरूरत से अधिक कठोर है.

HC ने मानवीय त्रुटि मानने से किया इनकार

रिकॉर्ड पर गौर करने के बाद अदालत ने कहा कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने अंक बढ़ाकर नहीं दिखाए थे बल्कि अलग प्रारूप में उनका उल्लेख किया गया था जिसे एक वास्तविक गलती माना गया. हालांकि, कुछ याचिकाकर्ताओं ने आवेदन पत्र में अधिक अंक भरे थे.

उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों को आधार बनाते हुए अदालत ने कहा कि अधिक अंक भरने को महज मानवीय त्रुटि नहीं माना जा सकता, बल्कि यह जानबूझकर किया गया कृत्य है जो भर्तियों में योग्यता के आधार पर स्थिति को बदल सकता है.