कॉकरोच जनता पार्टी को 'राष्ट्रविरोधी' बताने की मांग पहुंची इलाहाबाद HC, कोर्ट ने क्या लिया फैसला?
Cockroach Janta Party: याचिकाकर्ता ने अमेरिका में रह रहे पुणे निवासी अभिजीत दीपके पर आरोप लगाया था कि उन्होंने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की स्थापना की है, जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंगलवार (2 जून) को कॉकरोच जनता पार्टी की कथित ‘राष्ट्रविरोधी गतिविधियों’ और युवाओं को भड़काने के लिए सोशल मीडिया मंच के इस्तेमाल की जांच के अनुरोध संबंधी जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.
अदालत द्वारा क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी. न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर फौजदारी जनहित याचिका पर यह आदेश पारित किया.
राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोप
याचिकाकर्ता ने अमेरिका में रह रहे पुणे निवासी अभिजीत दीपके पर आरोप लगाया था कि उन्होंने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) नामक एक गैर-पंजीकृत संगठन की स्थापना की है, जो कथित तौर पर विदेशी धन के माध्यम से राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त है.
याचिका में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा व्यापक जांच कराए जाने का अनुरोध किया गया था.
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याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दी दलील
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और एक्स जैसे मंचों पर संचालित कई सोशल मीडिया खातों का इस्तेमाल देश के युवाओं को प्रभावित करने और भड़काने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने केंद्र सरकार को ऐसे खातों को तत्काल ब्लॉक या बंद करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया था.
सुनवाई के दौरान, पीठ ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने याचिका और संलग्न हलफनामे में स्वयं को बेंगलुरु का स्थायी निवासी बताया है. न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह मामला राष्ट्रीय महत्व का है और याचिकाकर्ता को सर्वप्रथम कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर करनी चाहिए थी.
पीठ ने रेखांकित किया कि याचिका में उत्तर प्रदेश के अंतर्गत उत्पन्न होने वाले किसी विशिष्ट कारण का उल्लेख नहीं है. अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता पहले भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो चुका है और उसने बेंगलुरु निवासी के रूप में स्वयं की पहचान बताई थी और इसी आधार पर कुछ रियायतें मांगी थीं.
उच्च न्यायालय द्वारा यह संकेत दिए जाने के बाद कि याचिका लखनऊ पीठ के समक्ष सुनवाई योग्य नहीं है, याचिकाकर्ता ने सक्षम न्यायालय में याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी. अनुरोध स्वीकार करते हुए, पीठ ने जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया और याचिकाकर्ता को उपयुक्त न्यायालय में नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की.
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