इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पुराने डकैती मामले में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया है. न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने इस मामले में अहम कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए अभियुक्त को राहत दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को केवल दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में की गई स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषी ठहराया था, जो कानूनन सही नहीं है. अदालत ने कहा कि 313 सीआरपीसी का बयान अपने आप में साक्ष्य नहीं होता, बल्कि इसका उपयोग अभियोजन साक्ष्यों को समझने के लिए किया जाता है.
'बिना ठोस सबूत के दोष सिद्ध नहीं हो सकता'
खंडपीठ ने कहा कि अभियुक्त द्वारा अपराध स्वीकार कर लेना तब तक पर्याप्त नहीं माना जा सकता, जब तक अभियोजन पक्ष उसके समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश न करे. इस मामले में अभियोजन ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा.
कोर्ट ने आजाद खान नामक अभियुक्त की तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए कहा कि उसने लगभग 24 वर्ष जेल में बिताए, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. अदालत ने यह भी संभावना जताई कि अपराध स्वीकार करने के पीछे जान का डर या दबाव हो सकता है.
कानूनी सहायता न मिलना गंभीर उल्लंघन- कोर्ट
अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियुक्त को न तो वकील उपलब्ध कराया गया और न ही किसी प्रकार की मुफ्त कानूनी सहायता दी गई. यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और सीआरपीसी की धारा 304 का स्पष्ट उल्लंघन है. मामले से जुड़े रिकॉर्ड के अनुसार फरवरी 2002 में मैनपुरी के विशेष न्यायाधीश/अपर सत्र न्यायाधीश (डीएए) ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 395 और 397 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
अभियोजन के मुताबिक, वर्ष 2000 में अल्लाऊ थाना क्षेत्र के कटरा गांव में 10 से 15 बदमाशों ने वादी ओमप्रकाश पांडेय के घर में घुसकर हमला किया. आरोप था कि बदमाशों ने नकदी और आभूषण लूटे तथा फायरिंग कर तीन लोगों को घायल कर दिया. बचाव पक्ष का कहना था कि ट्रायल के दौरान जब आजाद खान ने अपराध स्वीकार करने की अर्जी दी, तो उसका मामला अन्य आरोपियों से अलग कर दिया गया. इसके बाद अभियोजन ने किसी भी महत्वपूर्ण गवाह की जिरह नहीं कराई.
'सिर्फ औपचारिक गवाह पेश किया गया'
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने केवल एक कांस्टेबल को गवाह के रूप में पेश किया, जो मात्र औपचारिक गवाह था. कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार अभियोजन को अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है, जो इस मामले में नहीं किया गया.
एफआईआर और घटना का पूरा विवरण
मामले में 29 अक्टूबर 2000 को एफआईआर दर्ज की गई थी. वादी ने आरोप लगाया था कि बदमाशों ने उसकी पत्नी, बच्चों और भाई की पत्नी के साथ मारपीट की. शोर सुनकर गांव के लोग मौके पर पहुंचे और टॉर्च की रोशनी में बदमाशों की पहचान करने का दावा किया गया. बदमाश नकदी, गहने और बैंक व बीमा से जुड़े दस्तावेज लूट ले गए थे. फायरिंग में रमेश, उमेश और राजेंद्र घायल हुए, जिन्हें बाद में थाने ले जाया गया.
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
खंडपीठ ने अंत में कहा कि अभियोजन की गंभीर चूक और निष्पक्ष सुनवाई के अभाव में दी गई सजा टिक नहीं सकती. इसी आधार पर उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए अभियुक्त को रिहा करने का आदेश दिया गया.