उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (मोहम्मदिया कानून) के तहत तलाक को लेकर बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला दिया है. जिसमें कोर्ट ने कहा कि जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है, उसी तारीख से तलाक प्रभावी माना जाएगा. बाद में अदालत द्वारा दिया गया कोई भी आदेश केवल घोषणात्मक होता है, जोकि तलाक की पुष्टि करता है.

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यह आदेश तलाक की मूल तारीख से ही जुड़ा माना जाएगा और इससे कोई नया तलाक नहीं बनता. कोर्ट का यह फैसला उन मुस्लिम महिअलाओं के लिए बड़ी राहत है, जिनकी दूसरी शादी तलाक की घोषणा के बाद हुई हैं. यानि अब उन्हें पति से हर्जाना मिल सकता है.

सिंगल बेंच ने सुनवाई करते हुए दिया फैसला

कोर्ट में जस्टिस मदन पाल सिंह की सिंगल बेंच ने यह मामला सुना और फैसला दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोहम्मदिया कानून के मुताबिक, पति द्वारा तलाक का ऐलान करने की तारीख से ही माना जाता है. कोर्ट का बाद का आदेश केवल उसकी पुष्टि करता है न कि नई तलाक की तारीख. इसलिए डिक्री की तारिक्ष को तकनीकी आधार बनाकर महिला को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है.

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क्या था पूरा मामला ?

बता दें कि हुमायरा रियाज ने प्रयागराज के परिवार न्यायालय के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें CRPC की धारा 125 के तहत उनके दूसरे पति से खुद के भरण-पोषण की अर्जी खारिज कर दी गई थी. हालांकि, परिवार न्यायालय ने उनके दो नाबालिग बेटों के भरण-पोषण का आदेश दिया था.

फैमिली कोर्ट ने मुख्य रूप से यह आधार लिया था कि हुमायरा की पहली शादी कानूनी तौर पर तब तक खत्म नहीं हुई थी, जब तक कि कोर्ट ने डिक्री नहीं की थी.इसलिए दूसरी शादी अमान्य थी.

मुस्लिम महिलाओं का पक्ष अब मजबूत

कोर्ट के आदेश के बाद अब मुस्लिम महिलाओं का पक्ष मजबूत हो गया है, अब वे पति द्वारा तलाक के ऐलान वाले दिन से भरण-पोषण की हकदार होंगी. कोर्ट की डिक्री सिर्फ उसकी पुष्टि करेगी न कि नई तलाक की तारीख. इस तरह का विवाद कई केसों में सामने आया था, जिस पर आज कोर्ट ने तय कर दिया. फैमिली कोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि तलाक के ऐलान की तारीख को ही मूल आधार मानें न कि कोर्ट की डिक्री.