पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मदरसों के कामकाज, बुनियादी ढांचे और कानूनी स्थिति के सर्वेक्षण के आदेश तथा उत्तर प्रदेश में मदरसों में वंदे मातरम गाए जाने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है. एक ओर उत्तर प्रदेश के चीफ मुफ्ती मौलाना इंफ्राहिम हुसैन ने इन कदमों का समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर अलीगढ़ में इस मुद्दे पर लोगों की राय अलग-अलग देखने को मिली

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पश्चिम बंगाल सरकार के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी मदरसों का व्यापक सर्वेक्षण कराने का निर्देश जारी किया है. जिला प्रशासन को पांच जुलाई तक रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है. सर्वेक्षण में मदरसों की स्थापना, पंजीकरण, कानूनी दस्तावेज, विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या, पाठ्यक्रम तथा संस्थानों की श्रेणी से जुड़ी जानकारी जुटाई जाएगी. प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान किसी प्रकार की अनियमितता मिलने पर अलग से कार्रवाई की जा सकती है.

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मदरसों की जांच और वंदे मातरम पर चीफ मुफ्ती का समर्थन

पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के चीफ मुफ्ती मौलाना इंफ्राहिम हुसैन ने कहा कि मदरसों का सर्वेक्षण और उनकी जांच मुस्लिम समुदाय के हित में है. उनके अनुसार इससे मदरसों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा.

उन्होंने कहा कि मदरसों में वंदे मातरम गाए जाने से मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रभक्ति की भावना और मजबूत होगी तथा यह एक सकारात्मक कदम है. लंबे समय से मुस्लिम समुदाय मुख्यधारा से कुछ हद तक अलग-थलग रहा है और ऐसे प्रयास उन्हें समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद करेंगे. 

अलीगढ़ में बंटी राय, राजनीतिक दलों ने उठाए सवाल

दूसरी ओर अलीगढ़ में इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं. एआईएमआईएम के जिला अध्यक्ष यामीन अब्बासी ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में मदरसों, मस्जिदों और हिंदू-मुस्लिम मुद्दों को राजनीतिक रूप से उछाला जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार को बेरोजगारी और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए.

कुछ स्थानीय लोगों ने भी आरोप लगाया कि सरकार विशेष समुदाय को लेकर लगातार नए निर्देश जारी कर रही है, जिससे समाज में असहजता का माहौल बन रहा है. उनका कहना है कि शिक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

मदरसों को बंद करने तक की चेतावनी

अलीगढ़ के समाजसेवी गुलजार अहमद ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि मदरसों में वंदे मातरम को अनिवार्य किया जाता है तो मुस्लिम समाज को ऐसे मदरसों को बंद कर आधुनिक शिक्षा संस्थानों या सीबीएसई आधारित स्कूलों की स्थापना पर विचार करना चाहिए. हालांकि इस मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के भीतर भी एकमत राय नहीं दिखाई दी.

फिलहाल पश्चिम बंगाल में मदरसों के सर्वेक्षण और उत्तर प्रदेश में वंदे मातरम को लेकर जारी बहस के बीच यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है. समर्थक इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय एकता से जोड़ रहे हैं, जबकि विरोधी इसे धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं.

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