मुलायम ने सौंपी थी जिम्मेदारी, अखिलेश ने ली वापस; अब क्या करेंगे चाचा शिवपाल?
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लंबे समय से समाजवादी विचारधारा, सामाजिक न्याय और PDA की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा बदलाव किया है. लोहिया ट्रस्ट की कमान अब शिवपाल सिंह यादव की जगह अखिलेश यादव के हाथ में आ गई है. ट्रस्ट की बैठक में अखिलेश यादव को अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी. खास बात यह है कि इस फैसले में शिवपाल यादव भी शामिल रहे.
समाजवादी परिवार में 2017 में वर्चस्व की लड़ाई अपने चरम पर थी. अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच पार्टी और संगठन में पद को लेकर खुला संघर्ष था. ये विरोध सामने भी आया था. इसी दौर में लोहिया ट्रस्ट भी परिवार के भीतर शक्ति संतुलन का अहम केंद्र बना. तब शिवपाल यादव के पास ट्रस्ट की जिम्मेदारी थी. लेकिन करीब नौ साल बाद राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है. अब समाजवादी पार्टी की कमान अखिलेश यादव के पास है और लोहिया ट्रस्ट की जिम्मेदारी भी उन्हें मिल गई है. जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट की कमान भी अखिलेश के पास है.
क्या समाजवादी परिवार में ‘एक कमान’ का संदेश?
2027 के चुनाव से ठीक पहले इस फैसले का सबसे बड़ा सियासी संदेश यही माना जा रहा है कि समाजवादी परिवार और पार्टी से जुड़े प्रमुख संस्थागत मंच अब अखिलेश यादव के नेतृत्व में एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं. 2017 में जहां परिवार के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर टकराव था, वहीं 2026 में तस्वीर काफी अलग है.
शिवपाल यादव अब सपा के साथ हैं. वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और इस बार अखिलेश को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले में भी उनकी सहमति सामने आई है. यानी जिस रिश्ते में कभी टकराव था, वहां अब 2027 के लिए एकजुटता का संदेश दिखाई दे रहा है.
2027 के लिए अखिलेश का ‘विरासत कार्ड’
लोहिया ट्रस्ट सिर्फ एक संस्था नहीं है. इसका जुड़ाव समाजवादी आंदोलन और डॉ. राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक विरासत से है. अखिलेश यादव लंबे समय से समाजवादी विचारधारा, सामाजिक न्याय और PDA की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. अब लोहिया ट्रस्ट और जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट दोनों की जिम्मेदारी उनके पास होने से उनके पास समाजवादी आंदोलन की वैचारिक विरासत को अपने नेतृत्व से जोड़ने का एक और मजबूत मंच होगा.
यानी 2027 के चुनाव में अखिलेश का संदेश सिर्फ ‘BJP सरकार के खिलाफ चुनाव’ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह इसे ‘समाजवादी विचारधारा बनाम BJP की राजनीति’ के नैरेटिव में भी बदलने की कोशिश कर सकते हैं.
2017 से 2027 तक बदली तस्वीर
2017 में अखिलेश और शिवपाल के बीच टकराव ने समाजवादी पार्टी को कमजोर किया था. परिवार की अंदरूनी लड़ाई का असर संगठन और चुनावी प्रदर्शन पर भी दिखाई दिया. अब 2027 विधानसभा चुनाव करीब है. सपा अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिश कर रही है. अखिलेश यादव पार्टी के साथ-साथ समाजवादी विचारधारा से जुड़े प्रमुख संस्थानों पर भी अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं.





















